मशहूर निर्देशक श्याम बेनेगल करेंगे फिल्म को डायरेक्ट

बॉलीवुड अदाकार एवं रेसलर संग्राम सिंह शीघ्र ही रेसलर केडी जाधव के जीवन पर बायोपिक करने जा रहे हैं। इस बायोपिक को प्रसिद्ध निर्देशक श्याम
बेनेगल डायरेक्ट करेंगे। फिल्म को लेकर संग्राम सिंह बेहद उत्साहित हैं। फिल्म की शूटिंग दिसंबर में शुरु हो जाएगी। फिल्म को लेकर अदाकार संग्राम
सिंह बताते हैं कि वह केडी जाधव जी को अपना प्रेरणास्त्रोत मानते हैं। उन्हें खुशी है कि उनके जीवन पर बनी बायोपिक में वह मुख्य भूमिका निभाने
जा रहे हैं। फिल्म के लिए उन्होंने अभी से तैयारियां शुरु कर दी हैं। फिल्म के लिए वह काफी जी-तोड़ व्यायाम व मेहनत भी कर रहे हैं। फिल्म का टाइटल अभी तय नहीं हुआ है। संग्राम सिंह ने घटाया छह किलो वजन फिल्म के लिए संग्राम सिंह ने वजन काफी कम करना है। संग्राम बताते हैं कि केडी जाधव की भूमिका के  साथ इंसाफ करने के लिए वह कड़ी मेहनत कर रहे हैं। उन्होंने अपना वजन छह किलो कम कर भी लिया है और अभी पंद्रह किलो वजन
और कम करने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं।
संग्राम सिंह के अनुसार यह फिल्म युवाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत बनेगी। गौरतलब है कि इससे पहले पहलवानी व रेसलिंग पर 'दंगलÓ व 'सुल्तानÓ फिल्में बन चुकी हैं, मगर उन फिल्मों में आज की सहूलियतों के अनुसार रेसलिंग दिखाई गई है। मगर इस फिल्म में जहां रेसलर केडी जाधव के जीवन क ी व्यथा को बयां किया जाएगा, वहीं उस समय के दौर के हालातों के मद्देनजर किस तरह से केडी जाधव भारत के लिए पहली बार पदक लेकर आए थे, ये दिखाया जाएगा।

-- कुछ यूं संघर्ष भरा रहा केडी जाधव का जीवन --

मूल रुप से महाराष्ट्र के जिला सत्तारा के गांव बोलेश्वर के रहने वाले
रेसलर केडी यादव पर देश के लिए पदक जीतने का जुनून सवार था। मगर गरीबी के चलते उन्हें पदक जीतने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। उन्होंने अपने समय में पं. जवाहर लाल नेहरु समेत अनेकों नेताओं को चि_ियां लिख ओलंपिक खेलने में मदद की गुहार भी लगाई, मगर किसी ने एक न सुनी। आखिर ग्रामीणों ने अपने घरों के बर्तन, अन्य सामान व घर तक बेच उन्हें पानी के जहाज से अपने खर्चे पर ओलंपिक के लिए रवाना किया था। 21 दिन का सफर तय कर वह वहां पहुंचे।

उन दिनों में कोई सहूलियतें भी नहीं होती थीं। केडी जाधव ने पहली बार 1948 में लंदन ओलंपिक में भाग लिया था। उस समय वह छठें स्थान पर आए थे। मगर 1952 में फ्रिनलैंड में हुए ओलंपिक में वह भारत के लिए पहली बार रेसलिंग में कांस्य पदक जीत कर लौटे, जो देश के लिए गर्व की बात थी। गौरतलब है कि आज देश के लिए ओलंपिक लाने वाले खिलाडिय़ों पर सरकारें लाखों-करोड़ों रुपये बरसाती है। देश के लिए पदक जीतने वाले खिलाडिय़ों की जिंदगी ही बदल जाती है। मगर देश के लिए पहली बार सन 1952 ओलंपिंक में रेसलिंग में पदक जीतने वाले रेसलर केडी जाधव का जीवन गुमनामी भरा ही रहा और इलाज के अभाव में आखिरी क्षणों में उन्होंने सरकारी अस्पताल में ही दम
तोड़ दिया था। आज खिलाडिय़ों को खेलों में सभी सहूलियतें मिल रही हैं, मगर उन दिनों बगैर किसी सहूलियत के केडी जाधव संघर्ष कर भारत के लिए पदक लाए। इसके बावजूद उन्हें जीते जी कोई अवार्ड तक न नसीब हुआ। इलाज के अभाव में सरकारी अस्पताल में दम तोड़ दिया था केडी जाधव ने पहले पदक विजेता होने के बावजूद केडी जाधव सरकारों की अनदेखी का शिकार रहे। जीवन भर संघर्ष के बावजूद उन्हें कोई अवार्ड नहीं मिला। मगर मरने के दस वर्षों उपरांत उन्हें अर्जुन अवार्ड से नवाजा गया। आखिरी समय में इलाज के अभाव में उन्होंने सरकारी अस्पताल में दम तोड़ा था, जो बहुत दु:खद बात है।
उपल्बिध : 1952 में देश के लिए ओलंपिक में पहली बार पदक लाए थे केडी जाधव।
बेरुखी : जीते जी सरकार द्वारा कोई अवार्ड न देना उनके जीवन के लिए
बेरुखी भरा सबब रहा।
अनदेखी : गुमनामी में गुजर गई पहले पदक विजेता की जिंदगी

प्रस्तुति :- जगदीश जोशी, मुक्तसर

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