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डाक्टर ने किया मरीज के जीवन के साथ खिलवाड़ -डायलेसिस के बाद जांघ में छोड़ दिया नुकीला कैथेटर

तत्कालीन सी.एम.ओ की टीम ने बचाया, ए.डी.सी ने रिपोर्ट में सही पाए आरोप   करनाल में बहुचर्चित अस्पताल श्री रामचन्द्र चराया अस्पताल क...

तत्कालीन सी.एम.ओ की टीम ने बचाया, ए.डी.सी ने रिपोर्ट में सही पाए आरोप

 

करनाल में बहुचर्चित अस्पताल श्री रामचन्द्र चराया अस्पताल के एक डाक्टर ने एक मरीज के जीवन के साथ खिलवाड़ ही नहीं किया बल्कि उसका जीवन खतरे में डाल दिया। जिससे उसका जीवन समाप्त भी हो सकता था। इस मामले को जब तत्कालीन डी.सी के समक्ष उठाया गया तो तत्कालीन डी.सी ने सबसे पहले कार्रवाई करते हुए इसकी जांच तत्कालीन सिविल सर्जन को सौंपी। लेकिन तत्कालीन डी.सी, तत्कालीन सिविल सर्जन व सरकारी डाक्टरो की टीम द्वारा तैयार की गई जांच रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं हुए।


 उन्होंने तत्कालीन ए.डी.सी गिरीश अरोड़ा को दोबारा जांच के आदेश दे दिए। ए.डी.सी ने अपनी जांच में डाक्टर पर सभी आरोप सिद्ध पाएं। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में यह भी लिखा कि सरकारी डाक्टरों की टीम ने इस मामले में आरोपी डाक्टर को बचाने का प्रयास किया। उन्होंने महत्वपूर्ण तथ्यों को भी नजरअंदाज किया। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में सरकारी डाक्टरों की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े किए। यह मामला करनाल के एक न्यायालय में भी विचाराधीन है। इस मामले में न्यायालय ने आरोपी डाक्टर को इस बिनाह पर राहत दी है कि   जब तक डाक्टर को मेडिकल डाक्टरों की टीम दोषी साबित नहीं करती तब तक उसे न तो गिरफ्तार किया जा सकता और न ही उसके खिलाफ मामला दर्ज किया जा सकता। फरियादी इस मामले को लेकर ऑल इंडिया मेडिकल काऊंसिल और प्रदेश के चिकित्सा महानिदेशक के पास भी गया। फरियादी का दावा है कि वह न्याय के लिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक जायेगा। 

यह है पूरा मामला

 बदरपुर करनाल निवासी जसबीर सिंह 28 सितम्बर, 2013 को श्री रामचन्द्र मेमोरियल अस्पताल में भर्ती हुआ था। वह डा. कमल चराया के पास ईलाज के लिए आया। उसने शिकायतकर्ता को आई.सी.यू में रखकर ऑक्सीजन लगा दी। जबकि उसे सांस लेने में कोई दिक्कत नहीं थी और वह बार-बार मास्क को उतारता रहा। 29 सितम्बर, 2013 को मरीज को डायलेसिस टेबल पर लेटाकर डायलेसिस शुरू कर दी गई। यह प्रक्रिया 3 अक्टूबर तक जारी रही। 3 अक्टूबर को डायलेसिस के दौरान आपरेटर रामभज से कैथेटर की लगभग 6 इंच प्लास्टिक की लम्बी सुई जांघ में ही टूट गई। डाक्टर और कर्मचारियों ने सुई को निकालने का प्रयास किया। लेकिन सुई नहीं निकली। जबकि मरीज ने उससे कहा कि जांघ को सुन्न करके सुई को निकाल दें। लेकिन डाक्टरों ने उसकी एक नहीं सुनी और कैथेटर की सुई को जांघ में ही छोड़ दिया एक ओर कैथेटर को लगाकर इलाज शुरू कर दिया। इसके बाद डा. कमल चराया ने मरीज से कहा कि वह डाक्टर मिगलानी के पास चले जाएं। वह कैथेटर निकाल देंगे। लेकिन डाक्टर मिगलानी ने यह कहकर टाल दिया कि उनके पास आप्रेशन के बाद टांके लगाने वाला धागा नहीं है। मरीज किडनी का इलाज भूलकर कैथेटर की सोच में पड़ गए। 5 और 6 अक्टूबर को उन्होंने डायलेसिस करवाया।

 लारे लगाते-लगाते 7 अक्टूबर को डा. कमल चराया ने मरीज को डिस्चार्ज कर दिया। मरीज और उसके परिजन कैथेटर को लेकर कई और डाक्टरों से मिले। कई लोगों का यह कहना था कि इसे वास्कुलर सर्जन ही निकाल सकते है। यह सर्जरी केवल चंडीगढ़ या दिल्ली जैसे बड़े अस्पतालों में होती है। जब कमल चराया से बातचीत की तो उसने पल्ला झाड़ लिया। जब वह दिल्ली के गंगाराम हॉस्पिटल पहुुंचे तो उन्होंने मरीज को सच्चाई से अवगत करवाया कि कैथेटर जांघ से निकलकर दिमाग के अन्दर भी जा सकता है। जिससे मरीज का बचना संभव नहीं होता। 17 अक्टूबर, 2013 को जब आप्रेशन किया गया तो कैथेटर की सुई दिल के करीब थी। यदि कैथेटर दिल में चुभ जाता तो मरीज की मौत भी हो सकती थी। वहां के डाक्टरों ने आप्रेशन करके कैथेटर निकाल दिया।
डी.सी ने बड़े अधिकारियों से करवाई जांच
तत्कालीन डी.सी बलराज सिंह के पास जब मामला पहुंचा तो उन्होंने इसकी जांच सबसे पहले सिविल सर्जन को सौंपी। जब तत्कालीन डी.सी बलराज सिंह सिविल सर्जन की रिपोर्ट से संतुष्ट न हुए तो उन्होंने इसकी जांच तत्कालीन ए.डी.सी गिरीश अरोड़ा को सौंप दी। गिरीश अरोड़ा ने अपनी रिपोर्ट में सी.एम.ओ द्वारा गठित सरकारी डाक्टरों की कमेटी द्वारा की गई जांच पर सवाल खड़े किए। उन्होंने लिखा कि चिकित्सा अधिकारियों की कमेटी द्वारा प्रस्तुत की गई रिपोर्ट जिस पर सिविल सर्जन द्वारा भी सहमति जताई है वह न तो तथ्यों पर आधारित है और उक्त कमेटी द्वारा जांच रिपोर्ट में महत्वपूर्ण शहादतों को नजर अंदाज करके डा. कमल चराया को दोष मुक्त करने का प्रयास किया गया है। जांच के दौरान तत्कालीन ए.डी.सी ने पाया कि जो भी प्रमाण, दस्तावेज उनके समक्ष प्रस्तुत किए गए उनसे डा. कमल चराया पर शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोप सिद्ध होते है। तत्कालीन ए.डी.सी ने जो अपनी रिपोर्ट तत्कालीन डी.सी बलराज सिंह को सौंपी। उसमें उन्होंने यहां तक लिखा कि सरकारी अस्पताल के डाक्टरों के इस प्रकरण के आचरण से ही आम जनता की सरकारी तंत्र में विश्वसनीयता कम होती है।

क्या कहते है डाक्टर कमल चराया

 श्री रामचन्द्र मेमोरियल अस्पताल के संचालक डा. कमल चराया से जब बातचीत शुरू की गई तो उन्होंने इतना ही कहा कि वह नहीं समझते कि आपकी बात का जवाब दिया जाएं।

क्या कहते है आई.एम.ए के अध्यक्ष

 आई.एम.ए करनाल के अध्यक्ष डा. गगन कौशल ने कहा कि कोई भी डाक्टर मरीज का बुरा नहीं चाहता। वह अपनी क्षमता के अनुसार बेहतर करने का प्रयास करता है। गलती इंसान से ही होती है। इसके अलावा उन्हें इस प्रकरण की बहुत अधिक जानकारी नहीं है।

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