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जीवन की गति धन से नही धर्म से सुधारिए - साध्वी शुभिता

बुढलाडा 2 मार्च (बलविंदर जिंदल) जैन सभा बुढलाडा में विराजमान संयम शिरोमणि जैन भारती श्री सुशील कुमारी जी महाराज की सुशिष्या डॉ श्रमणी गौरव श्री सुनीता जी महाराज की सुशिष्या साध्वी श्री शुभिता जी महाराज ने धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए फ़रमाया की धन और धर्म हमारी जिन्दगी का एक प्रमुख अंग है। लेकिन आज कल का मानव धर्म को छोड़कर धन के पीछे दौड़ रहा है। साध्वी जी ने कहा की धन को धर्म से जोड़ना चाहिए धर्म को धन से कभी मत जोड़ो। क्योकि व्यक्ति की चाल धन से भी बदलती है,धर्म से भी बदलती है जब धन संपन्न होता है, तब अकड़ कर चलता है जब धर्म संपन्न होता है, विनम्र होकर चलता है। धन जब आता है तो इन्सान खुश होता है और धन जब जाता है तो दुखी होता है लेकिन धर्म दोनों ही परिस्थिति में सामान रहने की शक्ति प्रदान करता है।

धर्म कभी दावा नहीं करता कि तुम्हारी तक़लीफ़ शान्त हो जाएगी, लेकिन यह विश्वास जरूर दिलाता है कि यदि तुम धर्म की शरण में आये हो तो किसी भी तक़लीफ़ को पार ज़रूर कर लोगे। डॉ. साध्वी सुनीता जी महाराज ने फ़रमाया की मुश्किल से मिले हुए इस मानव जन्म को हमें संसार के नाशवान एवं अस्थिर पदार्थों को भोगने में तथा उनके लिए नाना प्रकार के पाप- कर्मों को करने में ही नहीं गंवाना चाहिए । आज व्यक्ति सांसारिक कार्यों को करने में तो सदा ततपर रहता है , किन्तु आत्मिक अर्थात आत्मा को लाभ पहुंचने वाले कार्यों के करने में प्रमाद करता है और उसकी यह प्रमाद- निद्रा कभी समाप्त नहीं होती, जीवन समाप्त हो जाता है । यह जीवन मिला न मिला समान ही रहता है । डाक़्टर सुनीता ने कहा जो व्यक्ति प्रमाद के वश में रहकर मनुष्य जीवन को व्यर्थ गंवा रहा है , वह अज्ञानी मनुष्य मानों सोने के थाल में मिट्टी भर रहा है । इसलिए प्रत्येक मुमुक्षु को जीवन का महत्व समझना चाहिए तथा मोह-निद्रा से जाग्रत हो जाना चाहिए । जब तक व्यक्ति प्रमाद अथवा मोह की नींद में सोया रहेगा उसे संसार की वस्तुओं में सुख और दुःख का अनुभव होगा । किन्तु इस नींद के उड़ते ही उसे समझ में आ जाएगा कि संसार की वस्तुओं से प्राप्त होने वाले सुख और दुःख नश्वर तथा सपने के समान हैं । 


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