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ईद मुबारक ( कविता )

कहू ईद मुबारक या चुप रहूं

खुदा के घर आज सन्नाटा है

चूप्पी में क्यों है शहर मेरा 

दिल मेरा घबराता है

रात तो चांद भी रोया था

वो तन्हाई के साथ सोया था

बदन पे उसके दाग थे बहुत

ये सवेरा कैसा हुआ था

गले लगूं किसके कोई पास नहीं

ईद मुबारक कहूं किससे कोई साथ नहीं

घर मै है बंद जान मेरी

निकलूं बाहर इतना साहस नहीं

लड्डू ,जलेबी ,रेवडी कुछ खा नहीं सकता

मजबूर हूं साहिब

घर राशन नहीं

कुछ बना नहीं सकता

मेरी नवाज को तू कबूल कर लेना

अपनी कलम से बस इतना लिख देना

खुशी हो लबों पर

दिल मै अच्छाई का जिक्र लिख देना

कहू ईद मुबारक या चुप रहू

खुदा के घर आज सन्नाटा है

गाेरखनाथ सिंह  

7743080522




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