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इंटरनेट की दुनिया में खोता जा रहा है बचपन, बच्चों पर मनोवैज्ञानिक असर अधिक पड़ रहा है
 बच्चे आज हमारी सोंच के आखिरी पायदान पर हैं। देखने में आ रहा है कि उनकी एक अलग ही दुनिया बस रही है और सीखने की कच्ची उम्र में वे रातोंरात युवा बन रहे हैं। कोरोना काल के चलते हम सभी मोबाईल, कम्प्यूटर और टी.वी. पर ज्यादा समय बिता रहे हैं, विशेष कर बच्चे। जब वे टेलीविजन के सामने होते हैं हमारी हालत बहुत दयनीय हो जाती है, क्योंकि हम अपनी मर्जी के कार्यक्रम नहीं देख पाते और बच्चों द्वारा देखे गए कार्यक्रम मजबूरी वश देखने पड़ रहे हैं। यह आंकड़ा वास्तव में चेताने वाला है कि खेलने-कूदने की उम्र के साढ़े छह करोड़ बच्चे इंटरनेट की दुनिया में इबे रहते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि इंटरनेट ज्ञान का असीम भंडार है पर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ज्ञान का यह भंडार सतही अधिक है। हालांकि यह सब कुछ होते हुए भी बड़े-बूढ़े, ज्ञानीध्यानी तक गुगल बाबा की सहायता लेने में कोई संकोच नहीं करते हैं पर बच्चों में इंटरनेट की लत पड़ने को किसी भी हालत में उचित नहीं ठहराया जा सकता है। इससे सीधेसीधे बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर गहरा असर पड़ रहा है। 
इंटरनेट की दुनिया में खोता जा रहा है बचपन, बच्चों पर मनोवैज्ञानिक असर अधिक पड़ रहा है

सबसे चिंतनीय यह है कि इंटरनेट की लत के चलते बच्चों पर मनोवैज्ञानिक असर अधिक पड़ रहा है। भारत इंटरनेट 2019 की हालिया रिपोर्ट में उभर कर आया है कि देश में 45 करोड़ के लगभग इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं। देश में से 11 साल की उम्र के बच्चों में साढ़े छह करोड़ बच्चे नियमित रूप से इंटरनेट का उपयोग करते हैं। हालांकि बदलते परिरश्य में 5 साल से कम उम्र के बच्चों के इंटरनेट के उपयोग के आंकड़ों को और जोड़ा जाए तो यह आंकड़ा और अधिक ही होगा। दरअसल स्मार्टफोन ने सबकुछ बदल कर रख दिया है। क्या बच्चे, क्या बड़ेबूढे घड़ल्ले से मोबाइल फोन का उपयोग कर रहे हैं। पीसी हो या लेपटॉप या फिर स्मार्टफोन, बच्चे

इंटरनेट का उपयोग करने में आगे हैं। कारण चाहे कोई भी हो पर इतनी बड़ी संख्या में बच्चों द्वारा इंटरनेट का उपयोग और यदि यह कहा जाए कि उपयोग ही नहीं लत है तो यह अपने आपमें गंभीर समस्या है। बच्चों की मिलनशीलता और संवेदनशीलता खोती जा रही है।

शारीरिक मानसिक विकास के परंपरागत गेम्स अब वीडियो गेम्स में बदलते जा रहे हैं। मरने मारने वाले गेम्स खेल कर बच्चे तेजी से आक्रमक होते जा रहे हैं। आपस में बात करने तक की फुर्सत नहीं दिखती। बच्चों में मोटापा, चिड़चिड़ापन, उदासी और शारीरिक गतिविधियां कम होती जा रही है। अपने में खोए रहने की लत बनती जा रही है। आपसी मेल जोल को यह इंटरनेट खत्म करता जा रहा है।

सोशल मीडिया, इंटरनेट, अति आधुनिक मोबाइल और तेज नेटवर्क ने इन्सान को जहां एक दूसरे से जोड़ने का काम किया है, वहीं इसके खतरे और दुष्परिणाम भी उभरकर सामने आए हैं। सिगरेट पीना, गाली देना, असंस्कारीपन का हावी होना, सामाजिक सोच से बेखबर, गलत आचरण को अपनाना, जघन्य अपराधों की दलदल में समाना आज इंटरनेट की ही देन है। इंटरनेट और मोबाइल फोन की लत युवाओं में ऐसे लग चुकी है जो छुटने का नाम ही नहीं ले रही है। समय रहते अगर इस समस्या पर काबु नहीं पाया गया तो आने वाला समय बहुत ही भयावह होगा। बच्चे जस दिशा में भागे जा रहे हैं, उससे अभिभावक काफी चिंतित है। इस समय पूरी दुनिया इंटरनेट के आगोश में है। ऑनलाइन बीत रहा लम्बा समय और स्मार्ट गैजेट्स की क्रीन तक सिमटी बच्चों की कोमल जिंदगी, कहने को कुछ नहीं ह जाता बल्कि यह स्थिति अपने आप में हालातों की गंभीरता को इशार्ती है। न तो इंटरनेट का विरोध और न ही इसकी उपयोगिता पर कोई प्रशन उठाया जा रहा है।

विजय गर्ग

 पूर्व पीईएस-1 सेवानिवृत्त प्राचार्य शिक्षाविद्

 मलोट पंजाब

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