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इंटरनेट के इस दौर में शोध कार्य या लेखन कार्य के लिए विषय सरलता से उपलब्ध हो जाता है - विजय गर्ग

 शोध और विकास के बीच गहरा संबंध है। शोध शाकायों के नतीजों के आधार पर ही विकास कार्यों के लिए नीतियां बनाई जाती हैं। इसलिए अकादमिक संस्थानों में किए जाने वाले शोध देश के समग्र विकास की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होते हैं। विज्ञान नीति पर चर्चा करते हुए एक बार प्रोफेसर जयंत विष्णु नालौकर ने कहा था कि भारत सरकार और विभिन्न सरकारों ने विज्ञान एवं अन्य अनुसंधानों को दिशा देने के लिए अनेक शोध संस्थान स्थापित किए हैं, ताकि एक वैज्ञानिक अपने विचार एवं क्रियाओं की स्वतंत्रता के साथ एक स्वायत्तशासी परिवेश में सक्रिय हो सके। लेकिन इन संस्थानों के प्रशासनिकीकरण, युवा वैज्ञानिकों के लिए शोध संबंधी रोजगार का हास, विश्वविद्यालयों में विज्ञान एवं समाज विज्ञान विषयों की उपेक्षा और इन क्षेत्रों में कार्यरत विशेषज्ञों की तुलनात्मक रूप से कम प्रतिष्ठा आदि ऐसे पक्ष हैं जो भारत की ज्ञान अर्थव्यवस्था के विकास के समक्ष गंभीर चुनौती पेश करते हैं। 

पिछले कुछ वर्षों से अकादमिक संस्थानों में किए जाने वाले शोध कार्यों की गुणवत्ता पर संदेह किया जाता रहा है। साथ ही वैश्विक पायदान में भी हमारा कोई विश्वविद्यालय उच्च स्थान प्राप्त नहीं कर सका है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या वास्तव में उच्च शिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों में शोध की स्थिति इतनी खराब है कि उसमें नवाचार, नवीनता, वैधता जैसे तत्वों का अभाव है? अगर ऐसा है तो क्यों? यह सोचने का विषय है?

वर्ष 2020 में कोविड के दौर में वैज्ञानिक शोधों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। देखा जाए तो लगभग एक लाख से ज्यादा शोध लेख विभिन्न वैज्ञानिक पत्र-पत्रिकाओं में छपे। लेकिन चिंताजनक बात यह है कि इन वैज्ञानिक लेखों की जो बहुस्तरीय बौद्धिक समीक्षा होती थी, अब यह समाप्त-सी हो गई है जिसके कारण अकादमिक धोखाधड़ी और अनैतिक व्यवहार बढ़ गया है। इसलिए वैज्ञानिक शोध आलेखों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ गुणवत्ता में गिरावट भी आती गई। देखा जाए तो यह न केवल शैक्षणिक जगत के लिए अपितु समाज व राष्ट्र के विकास के लिए भी गंभीर चिंता का विषय है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि वैज्ञानिक शोध जो एक निश्चित परिणाम लेकर विकसित होने चाहिए, ये अब नहीं हो रहे हैं। ऐसा लगने लगा है कि वर्तमान में हो रहे शोध विशेष रूप से विज्ञान के क्षेत्र में किए जाने वाले शोध बाजार को लाभ पहुंचाने वाली सूचनाएं ही उपलब्ध करवाने में जुटे हैं। जबकि वैज्ञानिक सूचनाएं पूर्वाग्रहों व व्यक्तिगत मूल्यों से रहित और विश्वसनीय होनी चाहिए, न कि बाजार केंद्रित । महामारी के दौर में कुछ दवाइयों के दुष्प्रभाव या किसी टीके से रोगी की मृत्यु होने या किसी अमुक दवा से कोविड से पूरी तरह स्वस्थ होने की खबरे आए दिन सुर्खियों में थी। फिर बाद में उनके खंडन या स्पष्टीकरण भी सामने आते रहे। ऐसी सूचनाएं तभी अस्तित्व में आ सकती हैं जब किसी शोष लेख को संबंधित विशेषज्ञों के समूह द्वारा समीक्षा किए बिना प्रकशित कर दिया जाए।

इस तरह की सूचनाओं ने समाज में लोगों में भय और भ्रम की स्थिति उत्पन्न करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। परिणामस्वरूप ऐसी घटनाएं भी सामने आई, जिसमें लोगों ने कोविड की चपेट में आने से पहले ही सिर्फ खौफ और गफलत के कारण अपनी जान तक दे

दी। इस तरह की भ्रामक और मिथ्या सूचनाओं को सार्वजानिक करना क्या अकादमिक बेईमानी नहीं कहा जाना चाहिए? कोई भी शोष या सूचना, चाहे वह चिकित्सा के क्षेत्र से संबंधित हो या राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक या फिर अर्थव्यवस्था से जुड़ी हो, बिना किसी बौद्धिक समीक्षा के सार्वजानिक नहीं की जानी चाहिए। यह शोधकर्ता और सूचनादाता की नैतिक जिम्मेदारी होती है। ऐसा न होने पर समाज में फैलने वाली अव्यवस्था और भय के लिए कौन जिम्मेदार होगा? यह विचारणीय विषय है।

इस दौर में ऑनलाइन राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय गोष्ठियों-सम्मेलनों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। इसमें न केवल विषय विशेषज्ञों के विवेचन और विश्लेषणों में भी कमी आई है बल्कि एक सामान्य जन के रूप में विषयों पर विवेचन और विमर्श बढ़ रहे हैं। एक और चुनौती जो सामने आई है, यह है कि वेबीनार में बिना सभागिता किए केवल फीस जमा करके या केवल जानकारी संबंधी फॉर्म भर कर ही प्रमाणपत्र लेना आसान हो गया है। क्योंकि एपीआइ स्कोर इस बात पर निर्भर करता है कि आपके पास अकादमिक कार्यक्रमों में सहभागिता के कितने प्रमाणपत्र हैं, न कि इस बात पर कि आपने कितने शोध आलेख प्रस्तुत किए, उनकी गुणवत्ता और वर्तमान में उनकी प्रासंगिकता क्या है। ऑनलाइन वेबिनार के दौर में हर कोई अधिकाधिक प्रमाण पत्र एकत्र करने में जुटा है। इसलिए क्या यह मान लिया जाना चाहिए कि महामारी का यह दौर शोध एवं सैद्धांतिक विवेचन के हादसों का दौर है? और यदि यह वास्तव में हादसों का दौर है तो महामारी के बाद के दौर में शोध की क्या स्थिति होगी, इसका अनुमान लगा पाना कठिन नहीं है।

वस्तुओं का बाजार सूचनाओं के बाजार में कम बदल गया, पता ही नहीं चला। चिंता इस बात की है कि बिना किसी सत्यता और प्रमाण के सुचनाओं का यह बाजार पत्र-पत्रिकाओं और सोशल मीडिया के माध्यम से समाज पर हावी हो गया है। खासतौर पर सोशल मीडिया एक ऐसे हथियार के रूप में सामने आया है जिस पर हर कोई अव्य या दृश्य माध्यमों से सुचनाएं प्रसारित करने में लगा है फिर भले ही उसकी सत्यता का कोई आधार हो या न हो। और लोग ऐसी सूचनाओं को आगे से आगे प्रेषित करने में भी नहीं चूकते। जब किसी समाज में लोकतांत्रिक संस्थाओं का अस होने लगता है और शिक्षक, बुद्धिजीवी वर्ग सता का गुलाम हो जाता है या जिसकी सोच केवल अपने लाभ तक ही सीमित हो जाती है, तब ऐसी ही स्थितियां उत्पन्न होती हैं। सैद्धांतिक, विचारधारात्मक और आनुभविक शोध के बिना कोई भी लेख किसी जनसाधारण के विवेचन की तरह ही होते हैं। ऐसे शोधों में उन सब पक्षों को दरकिनार कर दिया जाता है जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अनिवार्य रहे हैं और ऐसा करना किसी भी विषय के विकास के लिए उपयुक्त नहीं कहा जा सकता।

सर्वेक्षण एवं अनुसंधान, ज्ञान एवं सूचनाओं का तार्किक विश्लेषण, वैचारिक सहभागिता और अनवरत लेखन जिन्हें अकादमिक बुद्धिजीवियों की महत्त्वपूर्ण विशेषताओं में गिना जाता है, वर्तमान दौर में हाशिये पर नजर आती हैं, क्योंकि शोध कार्य या लेखन कार्य के लिए विषय का संपूर्ण ज्ञान, तार्किक क्षमता और प्रतिबद्धता का होना आवश्यक है। लेकिन इंटरनेट के इस दौर में बिना अधिक प्रयास किए सब कुछ सरलता से उपलब्ध हो जाता है। हकीकत यह भी कि अब शोध का उद्देश्य ज्ञान प्राप्ति के बजाय केवल डिग्री हासिल करना भर रह गया है। इसका बड़ा कारण यह भी है कि  डिग्री  के बिना शिक्षण संस्थानों में पदोन्नति असंभव हो गई है। जब शिक्षा अपने मूल उद्देश्य से भटक जाए तो उसके परिणाम कितने हानिकारक हो सकते हैं, वर्तमान दौर के संकटों में इसे समझा जा सकता है। राबर्ट योकॉक का यह तर्क प्रासंगिक ही है कि उपभोक्ता समाज ने महानगरीय युद्धिजीवियों को उत्पन्न किया है जो उत्पादित वस्तु के बाजार हेतु चिंतन को विकसित करते हैं और परिणामस्वरूप सामाजिक सरोकारों से जुड़े प्रश्न हाशिये पर चले जाते हैं।

इंटरनेट के इस दौर में  शोध कार्य या लेखन कार्य के लिए विषय सरलता से उपलब्ध हो जाता है - विजय गर्ग

विजय गर्ग

 सेवानिवृत्त प्राचार्य

 मलोट

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