Type Here to Get Search Results !

सैनिक स्कूलों में लड़कियों को प्रवेश की अनुमति, अब फिजाओं में गुजेंगे बहादुरी के किस्से

सैनिक स्कूलों में लड़कियों को प्रवेश की अनुमति, अब फिजाओं में गुजेंगे बहादुरी के किस्से

 तीन साल पहले यूपी सैनिक स्कूल ने 58 साल के इतिहास को पलटते हुए पहली बार अपने यहां 17 लड़कियों को प्रवेश दिया था ताकि वह भी लड़कों की तरह यूनिफार्म पहनकर सैनिक, सेलर व पायलट बन सकें। तब तक यह उम्मीद नहीं थी कि अगले दो सालों के भीतर ही देशभर के सैनिक स्कूलों में लड़कियों को प्रवेश की अनुमति मिल जायेगी। हालांकि लड़कियां लंबे समय से इसके लिए आंदोलन कर रही थीं। लेकिन यूपी सैनिक स्कूल में इन 17 लड़कियों के एडमिशन को किसी नई शुरूआत का पहला कदम मानने के बजाय, एक प्रतीकात्मक हीलिंग टच ही समझा गया था,वह भी इसलिए क्योंकि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा लखनऊ में 1960 में स्थापित, यूपी सैनिक स्कूल देश का एकमात्र ऐसा सैनिक स्कूल है, जिसे सेना की बजाय उत्तर प्रदेश की सरकार चलाती है। अब रक्षा मंत्रालय ने अगर दो साल बाद 10 फीसदी लड़कियों को और प्रधानमंत्री ने बिना किसी प्रतिशत उल्लेख की सीमा के सैनिक स्कूलों में प्रवेश की इजाजत दी है, तो मान जाना चाहिए कि इसके लिए जमीन इन 17 लड़कियों ने ही तैयार की थी।

काफी सख्त अनुशासन 

यहां सवरे 4:45 पर बिस्तर से उठना पड़ता है ताकि ग्राउंड में 6 बजे की फिजिकल एक्सरसाइज की जा सके। इसके बाद फिर 9 बजे उन्हें स्कूल जाना होता है। स्कूल के बाद दोपहर 3 बजे से 4 बजे तक आराम और फिर शाम 5 से 6 बजे तक एक घंटे की एक्सरसाइज  रात में 8 बजे डिनर लेने के बाद सेल्फ-स्टडी। रात 10:30 तक हर कोई बिस्तर में होता है। शुरू में जो लोग लड़कियों के सैनिक स्कूल में प्रवेश के पक्ष में नहीं थे, उनका तर्क होता था कि लड़कियां इतना टाइट शिड्यूल बदाश्त नहीं कर सकती। लेकिन जिन 17 लड़कियों को प्रयोग के तौरपर प्रवेश दिया गया था, ये न केवल छह महीनों में बाकी लाड़कों की तरह ही इस पुरे शिड्यूल के साथ सहज हो गई बल्कि कई मामलों में उनका परफोर्मस लड़कों से भी बेहतर रहा। एक्सरसाइज में भी ये लड़कों से एक कदम आगे ही चुस्त दुरुस्त साबित हुई। लड़कियों के इस परफोर्मेस को देखकर ही शायद पहले रक्षा मंत्रालय ने और अव प्रधानमंत्री ने लड़कों की तरह ही लड़कियों के लिए भी सैनिक स्कूलों के दरवाजे खोले हैं। 

फिजाओं में गुजेंगे बहादुरी के किस्से 

लगभग तीन साल पहले सैनिक स्कूलों में लड़कियों को प्रवेश देने का एक छोटा, शांत मगर क्रांतिकारी कदम उठाया गया था,जो अब कामयाबी की कहानी बन चुका है। यह लिंग समता की दिशा में भी उठाया गया स्वागत योग्य कदम है। हालांकि भारतीय सशस्त्र बलों में महिला अधिकारी 1992 से ही हैं, लेकिन महिलाओं को आमतौर से सहायक क्षेत्रों जैसे शिक्षा, इंजीनियरिंग, मेडिसिन आदि में हो  प्रवेश किया जाता था। साल 2016 में ही भारतीय वायु सेना ने तीन महिला फाइटर पायलट्स को भी किया। फिर भी, 1955 में पुणे में स्थापित नेशनल डिफेंस अकादमी (एनडीए),जो देश में सैन्य शिक्षा की प्रमुख संस्था है, पुरुष प्रधान ही रही। अब जब सैनिक स्कूलों ने अपने दरवाजे लड़कियों के लिए खोल दिया तो इस क्रांतिकारी व ऐतिहासिक

कदम के चलते वह दिन दूर नहीं जब लड़कियां भी सीमा पर अपनी बहादुरी के कारनामें प्रदर्शित करती हुई नजर आयेंगी। . सवाल यह है कि इसक्रांतिकारी घोषणा के अनुरूप सैनिक स्कूलों में आवश्यक इंफ्रास्ट्रकर व संसाधनों का इंतजाम भी कर लिया गया है या नहीं? 19-वर्ष से सैनिक स्कूलों में अध्यापन का कार्य कर रहे जेकेपी सिंह का कहना है कि फिलहाल तो सिर्फ घोषणा हुई है, आवश्यक संसाधनों में सुधार व वृद्धि के बारे में कोई संकेत नहीं दिया गया है, शायद कुछ दिन बाद दे दिया जाये। वह कहते हैं, सैनिक स्कूलों में लड़कियों को प्रवेश तो बहुत पहले दे दिया जाना चाहिए था। अब स्कूलों को चाहिए कि ध्यानपूर्वक जरूरी इंफ्रास्ट्रकर का विकास करें जैसे वाशरूम, हॉस्टल, सिक्युरिटी सर्विसेस और महिला स्टाफ जो हाउस मास्टर्स व होस्टल वार्डस के रूप में 24 घंटे इयूटी पर रहें।


विजय गर्ग

 पूर्व पीईएस-1 सेवानिवृत्त प्राचार्य

 मलोट

Post a Comment

0 Comments
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.