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छोटी- छोटी खुशियों की अहमियत को कम न समझें

 एक और वर्ष हमसे विदा हो रहा है। लोग इसका हिसाब-किताब लगाने लगे हैं। कहां जाना था और कहां तक पहुंच पाए हैं। जरूरी नहीं कि हमें वह सब कुछ हासिल हो जाए, जिसका लक्ष्य लेकर चले थे। यह भी जरूरी नहीं कि अपनी नाकामियों पर निराशा के गर्त में डूब जाया जाए। वर्ष के आकलन में भले हम लक्ष्य से पीछे रह गए हों, मगर हमने जो किया, उससे भी हमने पाया ही है और सबसे बड़ी बात कि हम पहले के मुकाबले और परिपक्व हुए हैं। इसलिए जो नहीं हुआ, उसका शोक क्यों मनाया जाए! जो हुआ उसका जश्न क्यों न मनाया जाए?

यह सच है कि कभी-कभी सब कुछ होते हुए भी हमारा मन नाउम्मीदी और निराशा की खाई में गिर जाता है। इस वजह से हमें लगने लगता है कि हम खुश नहीं। लेकिन क्या यह सबसे बड़ी वजह होनी चाहिए? हमारी जिंदगी में बहुत सारी कमियां हैं। हम जो चाहते थे, वह नहीं हो पाया। खासकर इस वक्त जो माहौल है, उसमें अनचाहे ही निराशा में घिर जाना कोई बड़ी बात नहीं। इस तरह असंतुष्टि और निराशा की पकड़ मजबूत होने लगती है। हम खामखा इस खूबसूरत जिंदगी को भार समझने लगते हैं। जबकि जिंदगी हर हाल में जीने लायक होती है।

कितनी भी कठिनाइयों से भरा जीवन क्यों न हो, प्रकृति से मिला हमारा जीवन हमें मुस्कराने की वजहें देता है। कुदरत ने हमें कितने भावों से युक्त कर भेजा है- प्रेम, ममता, दया, करुणा, वात्सल्य, आनंद। क्या हम इन सभी भावों का इस्तेमाल कर रहे हैं? क्या हम इन्हें जीवन में उतार रहे हैं? अपने जीवन को सार्थक और सुखद बनाने के लिए हमें इन भावों को काम पर लगाना होगा।

हमारी कामयाबी भले किसी लक्ष्य पर निर्भर हो, मगर हमारी जिंदगी अंतिम तौर पर लक्ष्य नहीं होती। जिंदगी हंसने और हंसाने, महसूस करने और थोड़ी-सी सामाजिकता को बनाए रखने का नाम है। हमारे पड़ोसी का बेटा पढ़-लिख कर किसी अच्छी कंपनी में नौकरी करने लगा है। वह अधिकतर घर से ही काम करता है। मैंने उसे कई-कई घंटे लगातार लैपटाप पर काम करते हुए देखा है। कमरा बंद करके। उसकी लगन देख कर मुझे पक्का यकीन है कि वह अपने सारे मकसद हासिल कर रहा होगा।

मगर वह किसी से बात नहीं करता। उसकी मां जब-तब उसके लिए नाश्ता बना कर कमरे के बाहर खड़ी होकर दरवाजा खटखटाती रहती है। बड़ी देर बाद वह पल भर को दरवाजा खोलता है और फिर बंद। घर से बाहर खुली हवा में एक पल के लिए भी चैन से बैठे मैंने उसे कभी नहीं देखा। उसे किसी भी तरह की बाधा नहीं चाहिए। यहां तक कि किसी के दुख या बीमारी में भी वह कहीं आने-जाने से बचता है। उसे अब कोई अपने बराबर के स्तर का नहीं लगता। अपना आस-पड़ोस, अपना बड़ा-सा घर भी।

यही वजह है कि उसने इस इलाके से बहुत दूर जाकर एक अपार्टमेंट की पच्चीसवें मंजिल पर किराए का घर ले लिया है। जबकि उसके पास अपना घर है। वह अपना लक्ष्य जरूर प्राप्त कर रहा है, मगर क्या जिंदगी भी हासिल कर रहा है? बहुत सारे मां-पिता चाहते हैं कि उनका बेटा तनख्वाह के रूप में मोटी रकम पाए। पर क्या जिंदगी को पैसों से तोला जा सकता है? मोटी तनख्वाह कहीं व्यक्ति को जिंदगी से ही दूर न लेकर चली जाए! इंसान में न्यूनतम इंसानी आचरण और गुण को मोटी तनख्वाह या आर्थिक आय केहवाले नहीं किया जा सकता।

इंसान एक सामाजिक प्राणी है। असामाजिकता हमारे भीतर अवसाद भरती है और अवसाद हमें निराशा के गर्त में ले जाता है। इसलिए अगर हमारा लक्ष्य पीछे रह गया तो मलाल करने या निराश होने की जरूरत कतई नहीं है। हमारे पास परिवार है, दोस्त हैं, पड़ोसी हैं, बात करने वाले लोग हैं, आसपास बाग-बगीचे हैं। बस हमें इनके साथ वक्त बिताने का मौका तलाशना है। फिर हम देख सकते हैं कि हमारे मन की निराशा किस तरह वाष्पित होकर खुशी में बदल जाती है। खुश रहने के लिए बहुत बड़ी वजहें तलाशने में हम जिंदगी के अनमोल क्षणों को खोते जा रहे हैं।

खुशियों की खरीदारी करने में लगे हुए हैं। मगर अफसोस कि खुशियां बाजार में नहीं मिलती। ब्रांडेड कपड़े पहनने और महंगी गाड़ियों में चलने वाले सभी लोग क्या खुश भी होते हैं? दरअसल, खुशियां तो छोटी-छोटी बातों में भी मिल जाती हैं। किसी दिन पार्क में बैठ कर किसी बच्चे को देखिए। वह खेल-खेल में अपने साथी को पकड़ लेने, किसी तितली के पीछे भागने, गेंद को लपक लेने से भी भरपूर आनंद की अनुभूति करता है। छोटी खुशियों की अहमियत को कम न समझें। फिर मन की सारी कुरूपता, सारी निराशा छू मंतर हो जाएगी। और फिर देखिए कि यह संसार कितना सुंदर लगने लगता है!



विजय गर्ग 

सेवानिवृत्त प्राचार्य

 मलोट पंजाब

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