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इंटरनेट के कब्जे में किशोर

इंटरनेट के कब्जे में किशोर

 बच्चों एवं किशोरों में साइबर एडिक्शन यानी इंटरनेट और सोशल मीडिया की इस लत को कम करने के लिए ही देश में इंटरनेट डी-एडिक्शन सेंटर्स की जरूरत महसूस की गई। करीब दो साल पहले बेंगलुरु में पहला सेंटर खोला गया, जिसका काफी अच्छा रिस्पॉन्स मिला। हाल ही में दिल्ली के एम्स में भी साइबर एडिक्ट क्लीनिक की शुरुआत हुई है। दरअसल, आज देश ही नहीं, दुनिया भर में इंटरनेट की लत एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। खासकर बच्चे-किशोर इसकी गिरफ्त में सबसे ज्यादा हैं। किशोरों सहित कोई भी व्यक्ति इंटरनेट और सोशल मीडिया की इस लत से खुद को कैसे बचा सकता है, आइए जानते हैं...

जरूरत के मुताबिक इस्तेमाल

पहले तो यह समझें कि आखिर इंटरनेट एडिक्शन होता क्या है? विशेषज्ञों की मानें, तो यह एक ऐसी मनोस्थिति है, जब लोग घंटों ऑनलाइन गेम, नेट सर्फिंग या सोशल साइट्स पर समय बिताने लगते हैं। कोई समय-सीमा नहीं रहती। खुद पर नियंत्रण कम होता जाता है। इंटरनेट नहीं मिलता, तो अधीर, बेचैन या अवसाद से ग्रस्त हो जाते हैं। यहां तक कि झूठ बोलने, समस्याओं से भागने लगते हैं और जल्द ही नकारात्मक हो जाते हैं।

अगर आप भी इस तरह की किसी परेशानी से जूझ रहे हैं, तो समय रहते सचेत हो जाएं। इंटरनेट पर उतना ही वक्त बिताएं, जितनी जरूरत हो। कभी भी सोते समय फोन या टैबलेट बेड पर न रखें। ई-बुक के स्थान पर कोई किताब पढ़ें।

दोस्तों-परिजनों से सीधा संवाद

इसमें दो मत नहीं कि इंटरनेट की सुविधा स्कूल से लेकर घर हर जगह उपलब्ध है। इंटरनेट से हमें कई प्रकार की जानकारियां मिलती हैं। पेशे की जरूरत के मुताबिक, लोग इसका इस्तेमाल करते हैं। ऑनलाइन एजुकेशन को बढ़ावा देने में इसकी अहम भूमिका रही है। यह दूर के रिश्तेदारों या दोस्तों से ऑनलाइन जुडऩे का एक प्रमुख माध्यम है, लेकिन जब वर्चुअल बातचीत अधिक होने लगे, पढ़ाई का समय व्हाट्सऐप या फेसबुक पर चैटिंग करने में बीतने लगे, तो वह एडिक्शन कहलाता है। इससे बचने के लिए दोस्तों, रिश्तेदारों या अभिभावकों से सीधा संवाद कायम करने की कोशिश करें। उनके साथ बाहर घूमने जाएं, साथ बैठकर भोजन करें। उनसे अपने मन की बातें साझा करें।

शौक करें विकसित

जानकारों की मानें, तो कई बार बच्चे अपना स्ट्रेस या अकेलापन दूर करने के लिए सोशल साइट्स पर निर्भर हो जाते हैं। कुछ संकोची बच्चे, किशोर, युवा आमने-सामने की तुलना में आभासी दुनिया में खुलकर बातें करते हैं। इससे इनका सामाजिक दायरा बढ़ नहीं पाता और एक वक्त के बाद वे अकेला महसूस करने लगते हैं। ऐसे में आपको उन कार्यों की पहचान करनी चाहिए, जिनमें सुकून और खुशी मिलती हो। अगर कोई शौक है, तो उसे निखारने का जतन करें। दोस्तों-सहपाठियों, परिजनों या काउंसलर का एक ऐसा सपोर्ट सिस्टम विकसित करें, जो मुश्किल घड़ी में आपके साथ खड़े हों। आपको अपनी भावनाओं को बेहतर तरीक से नियंत्रित करने की आदत भी डालनी चाहिए।

ऑनलाइन को दें निश्चित समय

इंटरनेट की लत न लगे, इसका सबसे अच्छा उपाय है एक निश्चित समय निर्धारित करना। आप जब भी ऑनलाइन जाएं, तो समय का पूरा ध्यान रखें। इस बात का भी खयाल रखें कि दिन में कितनी बार आपने ऑनलाइन चैटिंग, काम या पढ़ाई की। अगर लगे कि इससे आपकी बाकी जरूरी गतिविधियों या दिनचर्या पर असर पड़ रहा है, तो सावधान हो जाएं। प्राथमिकता तय करें। आप चाहें, तो ऑनलाइन जाने से पहले टाइमर सेट कर लें और खुद से वादा करें कि निर्धारित समय के बाद कंप्यूटर या लैपटॉप बंद या स्मार्टफोन का डाटा ऑफ कर देंगे। स्कूल, कोचिंग या किसी और हॉबी क्लास के दौरान फोन बंद कर देना भी अच्छा विकल्प है।

बचें सेल्फी के जुनून से

आज बच्चों से लेकर बड़ों तक को सेल्फी की भी लत लग गई है। एक अनुमान के अनुसार, किशोर एक दिन में 100 से अधिक सेल्फी स्मार्टफोन या फेसबुक पर अपलोड करते हैं। वे उम्मीद करते हैं कि ज्यादा से ज्यादा लोग उन तस्वीरों को पसंद करें। ऐसा न होने पर वे बेचैन हो जाते हैं और इसकी वजह से आत्मकेंद्रित भी होते जाते हैं।

बच्चों को दें पूरा समय

किशोर उम्र के बच्चों की फिजिकल एक्टिविटी को वर्चुअल मीडिया और स्मार्टफोन ने काफी हद तक प्रभावित किया है। बच्चों का ज्यादा समय वीडियो या मोबाइल गेम्स खेलने में बीतता है। आउटडोर गेम्स खेलना कम होता जा रहा है। बच्चे आमने-सामने बातचीत की बजाय व्हाट्सऐप, स्नैपचैट आदि का सहारा ले रहे हैं। फेसबुक पर दोस्तों की फेहरिस्त भले ही बढ़ रही हो, लेकिन रिश्तेदारों या खुद अपने अभिभावकों से मिलना या उनसे बात करने का समय नहीं रहा इनके पास। इससे बच्चों का अकेलापन बढ़ रहा है। वे अवसाद के शिकार हो रहे हैं। इसके लिए कहीं न कहीं अभिभावक भी जिम्मेदार हैं। बच्चों पर ध्यान देने या उनकी जिंदगी में झांकने की

जगह वे अपने खाली समय में स्मार्टफोन और इंटरनेट से चिपके होते हैं, जबकि उन्हें बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताने की जरूरत है। उनके साथ डिनर करें। बातें शेयर करें। उनकी समस्याओं या उलझनों को सुलझाने का प्रयास करें।

भावनात्मक तलाश में भटकाव

किशोरावस्था उम्र का वह पड़ाव है जब बच्चों में कई प्रकार के हॉर्मोनल बदलाव होते हैं। वे दूसरों में भावनात्मक लगाव तलाशते हैं। सोशल मीडिया उन्हें एक ऐसा मंच दे रहा है, जहां वे नये मित्र बनाते हैं। उनसे बेझिझक बातें करते हैं। जो बच्चे थोड़े शर्मीले प्रवृत्ति के होते हैं, वास्तविक जीवन में आमने-सामने बात-व्यवहार करने से संकोच करते हैं। ऐसे बच्चे सोशल मीडिया पर अपनी भावनाएं निर्बाध रूप से अभिव्यक्त कर पाते हैं। इस तरह आभासी दुनिया ही उनका समाज बन जाता है।

वे अपना अधिक से अधिक समय वहां बिताने लगते हैं। इसके अलावा, कुछ क्षणों में पहचान कायम करने का यह सबसे सरल माध्यम है। किशोरों को लगता है कि वर्चुअल वल्र्ड में सक्रिय रहने से एक सेलेब्रिटी स्टेटस मिल जाता है। बेशक सोशल मीडिया की पहुंच बढऩे से कई सकारात्मक परिवर्तन आए हैं, लेकिन किसी भी चीज का बेजा इस्तेमाल विपरीत परिणाम देता है। साइबर एडिक्शन भी वही है। बेहतर होगा कि किशोर और युवा सोशल

मीडिया के लिए दिन का एक समय निर्धारित कर लें, जब वे दूसरों की विचारधारा को जानने के अलावा अपनी बात भी प्रभावी तरीके से रख सकें।

गेेम्स का एडिक्शन

स्मार्टफोन में वीडियो गेम्स के सभी फीचर्स होने से बच्चों-किशोरों को ऐसी लत लगी है कि वे 6 से 10 घंटे लगातार स्मार्टफोन पर गेम्स खेल रहे हैं। इससे पढ़ाई तो प्रभावित होती ही है, साथ में सामाजिक दायरा भी सिकुड़ता जा रहा है।


विजय गर्ग 

सेवानिवृत्त प्राचार्य

 मलोट

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