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जनजातीय युवा बेरोजगारों को व्यावसायिक शिक्षा की जरूरत: विजय गर्ग

 भारत के सुदूर वनाच्छादित क्षेत्रों में जहां ज्यादातर युवा बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं, वहां व्यावसायिक शिक्षा की शुरुआत किए जाने की जरूरत है। वास्तव में छात्रों के स्वावलंबन की नींव व्यावसायिक शिक्षा के आधार पर ही टिकी है। परंपरागत शिक्षा से उलट व्यावसायिक शिक्षा आधारित नव-प्रवर्तन से इस दिशा में वांछित परिणाम हासिल किए जा सकेंगे।

देश के लगभग सत्रह प्रांतों में फैली जनजातियों से भारत भूमि का गहरा नाता रहा है। कुल आबादी में इनका हिस्सा लगभग साढ़े आठ फीसद है। महात्मा गांधी के उन्हें गिरिजन नाम से जोड़ने का मंतव्य भी यही रहा होगा कि भारतीय भू-भाग की वृहत्तर सांस्कृतिक-सामाजिक विरासत के जीवंत हिस्से के रूप में उन्हें जोड़ा जा सके। देश भर की छह सौ अनठानवे अनुसूचित जनजातियों की अपनी समृद्ध विरासत रही है। लेकिन शिक्षा, जीविकोपार्जन के स्रोतों और उद्यमिता से दूर रही इन जनजातियों का मुख्यधारा से कटे रहना अब अखरता है। बदले वक्त में उनका परंपरागत शिक्षा से इतर व्यावसायिक शिक्षा से जुड़ना न केवल प्रासंगिक हो गया है, अपितु अत्यावश्यक भी। जनजातीय छात्रों के समग्र विकास की आधारशिला की परिकल्पना पेशेवर शिक्षा को केंद्र में रख कर ही की जा सकती है।

वैसे भी व्यावसायिक शिक्षा जीविकोपार्जन के मूल में है। ज्ञान आधारित शिक्षा से इतर व्यावसायिक शिक्षा की मांग हाल के दिनों में तेजी से बढ़ी है। ज्ञान की विविधता के साथ जीविका आधारित शिक्षा के जरिए भविष्य को सुरक्षित रखना है तो व्यावसायिक शिक्षा के मूल मंत्र को समझना होगा। निसंदेह वस्तुनिष्ठ या सूचनापरक ज्ञान आमजन जीवन को भविष्य के उच्चतम विकल्प उपलब्ध करवाता है। लेकिन रोजगारपरक व पेशेवर शिक्षा के बिना अर्थोपार्जन की राह कठिन है। समाज के सभी वर्गों, विशेषकर वंचित या जनजातियों के लिए रोजगारपरक शिक्षा पर खासा जोर दिया जाना तात्कालिक रूप से जरूरी है, ताकि इसके बूते ही एक सशक्त और स्वावलंबी जनजातीय पीढ़ी अपने पैरों पर खड़ी हो सके और विकास की मुख्य धारा में शामिल हो सके।

लेकिन चिंता का विषय यह है कि देश के सुदूर वनवासी क्षेत्रों में परंपरागत शिक्षा से इतर कभी किसी दूसरी समकक्ष पेशेवर शिक्षा को वांछित महत्त्व नहीं दिया गया। आज भी देश के बड़े जनजातीय क्षेत्रों के सत्तर फीसद से अधिक कालेजों और विश्वविद्यालयों में व्यावसायिक शिक्षा जैसे किसी ऐच्छिक या अनिवार्य पाठ्यक्रम की विधिवत व्यवस्था नहीं है। व्यावसायिक शिक्षा, अकादमिक शिक्षा से कई मायनों में अलग है। इसमें ज्ञान और कौशल का, व्यावहारिक चुनौतियों और अर्थव्यवस्था की कार्य स्तिथियों के बीच गहरा संबंध होता है। इसे कौशल एवं कौशल विकास से अलग रख कर देखा जाना चाहिए। इस प्रकार की शिक्षा में ज्ञान और कौशल अभिवृति का एक एकीकृत रूप समाहित होता है। तेजी से बदलती कामकाजी दुनिया में जरूरी व्यावसायिक शिक्षा के माध्यम जनजातियों को न केवल कौशल बल्कि सैद्धांतिक ज्ञान, अभिवृति एवं मानसिकता के साथ किसी पेशे के लिए जरूरी तकनीकी कौशल भी दिए जा सकते हैं।

देश में जनजातीय युवा बेरोजगारों की बड़ी संख्या है, जिनमें से ज्यादातर केवल बुनियादी शिक्षा के भरोसे अपने भविष्य को संवारने के दिवास्वप्न में हैं। उनके पास वैकल्पिक शिक्षा का कोई विकल्प नहीं। और अगर अवसर उपलब्ध हो भी जाए तो संसाधन की भारी कमी बाधा बन जाती है। ऐसे में विशाल जनजातीय आबादी को केवल परंपरागत शिक्षा के जरिए रोजगार मुहैया कराना दुस्वप्न ही है। हालांकि अतीत में भी व्यावसायिक शिक्षा संबंधी सरकारी प्रयास किए जाते रहे हैं, पर उनके सफल क्रियान्वयन में अड़चने अधिक आई हैं। पेशों की सामाजिक हैसियत के पदानुक्रम ने उच्च शिक्षा में कई तरीकों से दिक्कतें पैदा की हैं। इसने व्यावसायिक शिक्षा के संबंध में आमजन की समझ और इसके चलते उच्च शिक्षा में छात्रों द्वारा किए जाने वाले चयन को भी काफी हद तक प्रभावित किया है। ऐसे कई कारण हैं जिसने व्यावसायिक शिक्षा के बारे में लोगों की सोच को प्रभावित किया है। अकादमिक और पेशेवर शिक्षा से व्यावसायिक शिक्षा के अलगाव और व्यावसायिक शिक्षा संस्थानों की सामान्यत: खराब गुणवत्ता ने स्पष्ट रूप से इसमें अपनी भूमिका अदा की है। इस स्थिति में तुरंत बदलाव की आवश्यकता है।

व्यावसायिक शिक्षा को जनजातीय छात्रों के लिए एक आकर्षक विकल्प बनाने की जरूरत है, ताकि ज्यादा से ज्यादा छात्र इसके प्रति उन्मुख हो सकें। इसके क्रियान्वयन में सुधार लाना एक बड़ा बुनियादी कदम होगा। इसके अतिरिक्त शिक्षक विकास और नियुक्ति, पाठ्यचर्या, बुनियादी संरचना आदि में सुधार की जरूरत होगी। इसे मुख्यधारा की शिक्षा से अलग न कर मुख्यधारा की शिक्षा से पूरी तरह से जोड़ना होगा, जिससे सभी छात्र व्यावसायिक शिक्षा के बारे में जान सके और उनके पास इसकी विशिष्ट शाखा को चुनने का विकल्प हो। इससे व्यावसायिक शिक्षा को व्यापक बनाने, सामाजिक स्वीकार्यता बढ़ाने और सभी छात्रों को केवल व्यावसायिक शिक्षा अथवा व्यावसायिक शिक्षा और पेशेवर एवं अकादमिक विषयों को संयुक्त रूप से पढ़ने के मौके देने में मदद मिलेगी।

व्यावसायिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कौशल विश्लेषण, स्थानीय अवसरों का पता लगाना, सभी शैक्षिक संस्थानों के साथ व्यावसायिक शिक्षा एकीकरण के लिए वित्तीय सहयोग, बुनियादी संरचना एवं व्यावसायिक शिक्षा को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए लोगों की भर्ती, तैयारी और सहयोग के लिए पर्याप्त निवेश, प्रशिक्षुओं को प्रोत्साहित करने जैसे कदम उठाने की जरूरत है। बहुत संभव है इससे छात्रो के लिए नई राह खुले। इसके अतिरिक्त सभी शैक्षिक संस्थानों द्वारा पाठ्यक्रम में पच्चीस फीसद व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को शामिल करना इस दिशा में एक अहम कड़ी साबित हो सकती है। फिर भी, छात्रों को आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बनाने की दिशा में बहुत कुछ किया जाना अभी शेष है। हालांकि इस दिशा में सकारात्मक पहल करते हुए जनजातीय कार्य मंत्रालय ने अपने बजट प्रावधान को 5329.32 करोड़ रुपए से बढ़ा कर 5957.18 करोड़ रुपए कर दिया है। साथ ही वर्तमान शैक्षणिक वर्ष के दौरान देश भर के विभिन्न एकलव्य माडल आवासीय विद्यालयों में नामांकित तिबत्तर हजार एक सौ पैंतालीस आदिवासी छात्रों को व्यवसायिक शिक्षा से जोड़ने का भी प्रयास किया जा रहा है।

लेकिन केवल इतने से बात नहीं बनने वाली। कौशल विकास कार्यक्रमों में कुछ विशेष पाठ्यक्रमों को जोड़ कर इस और सुग्राही बनाए जाने की जरूरत है। विभिन्न व्यावसायिक कार्यों जैसे कार्यालय प्रबंधन सहित योजना और प्रबंधन, सौर और बिजली, सौंदर्य विशेषज्ञ, हस्तशिल्प, रोजमर्रा के निर्माण कार्यों (जैसे नलसाज, राजमिस्त्री, फिटर, वेल्डर, बढ़ई आदि) के लिए आवश्यक कौशल, रेफ्रिजरेशन और एसी की मरम्मत, मोबाइल मरम्मत, पोषण, आयुर्वेदिक और जनजातीय औषधियां, आइटी, डेटा इंट्री, फेब्रिकेशन, पेरामेडिक्स और घर पर नर्स का प्रशिक्षण, वाहन चलाना आदि ऐसे हजारों कार्यक्रम हैं जिनसे जोड़ कर उन्हें आर्थिक सशक्तता की राह पर आगे बढ़ाया जा सकता है।

इसके अलावा बहु-तकनीकी सिक्षा केंद्रों के पुराने और व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम जो पहले से चल रहे हैं और जिनके जरिए छात्रों को इंजीनियरिंग और कंप्यूटर विज्ञान जैसे पारंपरिक विषयों में तीन वर्षीय डिप्लोमा पाठ्यक्रम प्रदान किया जाता है, इसे भी पुनर्जीवित करना होगा। इस कड़ी में राष्ट्रीय शहरी जीवन मिशन परियोजना और ‘आजीविका’ मिशन जैसी परियोजना से जनजातीय छात्रों को जोड़ कर रोजगार, पूरक ज्ञान, उपकरण, कौशल सेट और अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए वित्तीय मदद प्रदान करने संबंधी सुविधा दी जा सकती है। भारत के सुदूर वनाच्छादित क्षेत्रों में जहां ज्यादातर युवा बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं, वहां व्यावसायिक शिक्षा की शुरुआत किए जाने की जरूरत है। वास्तव में छात्रों के स्वावलंबन की नींव व्यावसायिक शिक्षा के आधार पर ही टिकी है। परंपरागत शिक्षा से उलट व्यावसायिक शिक्षा आधारित नव-प्रवर्तन से इस दिशा में वांछित परिणाम हासिल किए जा सकेंगे। यदि जनजातीय छात्रों को आर्थिक रुप से सशक्त बनाना है तो व्यावसायिक शिक्षा के महत्त्व को समझना होगा


विजय गर्ग 

सेवानिवृत्त प्राचार्य

 मलोट

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