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महामारी और पढ़ाई

  सोमवार को देश के बहुत से प्रदेशों में स्कूल-कॉलेज खुल गए, उनके परिसरों में पुरानी रौनक लौट आई। कंधों पर बस्ते लादे स्कूल जाते छोटे-छोटे बच्चों को देखना हमेशा ही सुखद होता है। कई राज्यों में सोमवार से ही यह दृश्य भी दिखाई देना शुरू हो गया और कुछ राज्यों में इसके लिए अगले सोमवार का इंतजार करना होगा। देश के ज्यादातर प्रदेशों में कक्षा नौ से ऊपर की सभी कक्षाओं की पढ़ाई सोमवार से शुरू हो गई है, जबकि एकाध राज्य में इसका उल्टा तरीका अपनाया गया है। वहां छोटे बच्चों के स्कूल पहले खोले गए हैं। यह अच्छी बात है कि देश के तकरीबन सभी राज्य एक साथ महामारी के दौर में शिक्षा-व्यवस्था को सामान्य बनाने में जुट गए हैं। इस समय जब नए संक्रमितों की दैनिक संख्या और संक्रमण की दर, दोनों नीचे आ रहे हैं, तब इस तरह का फैसला स्वाभाविक ही था।

महामारी और पढ़ाई

महामारी के खतरों को देखते हुए स्कूलों को खोला जाए या नहीं, इसे लेकर पिछले दो साल में पूरी दुनिया में खासी माथा-पच्ची हुई है। अमेरिका वगैरह में तो महामारी की पहली लहर के बाद ही स्कूल खोलने की कोशिशें शुरू हो गई थीं। लेकिन तब परिणाम अच्छे नहीं रहे थे। तभी यह खतरा भी समझ में आया था कि कोरोना वायरस भले बच्चों को शिकार नहीं बनाता, लेकिन कुछ बच्चे अगर इस वायरस को लेकर घर पहंुचते हैं, तो वयस्कों और बुजुर्गों को इससे खतरा हो सकता है। इस दो साल में पूरी दुनिया ने स्कूलों के गेट बंद कर ऑनलाइन शिक्षा की संभावनाएं और सीमाएं भी समझ ली हैं। यह भी समझ में आ गया है कि इस माध्यम से बच्चों को शिक्षित तो किया जा सकता है, लेकिन उनका पूरा मानसिक विकास नहीं हो सकता। ऑनलाइन शिक्षा संगी-साथियों का विकल्प नहीं दे सकती। स्कूलों में जब बच्चे एक-दूसरे से मिलते हैं, तो वे सामाजिक संबंधों का ककहरा भी सीखते हैं। इस समय जब बड़ी संख्या में लोगों का वैक्सीनेशन हो चुका है और देश की सभी गतिविधियां सामान्य रूप से चलाई जाने लगी हैं; बाजार खुल गए हैं और यहां तक कि चुनाव भी हो रहे हैं, तब यह अच्छी तरह समझ में आ चुका है कि पूर्ण बंदी से नुकसान भले हो जाए, कोई बहुत बड़ा फायदा नहीं मिलता। ऐसे में, सिर्फ शिक्षण संस्थानों को बंद रखने का कोई अर्थ नहीं रह गया है। 

पिछले कुछ समय में जिस भी गतिविधि को सामान्य किया गया है, सभी में यह आग्रह रहा है कि पूरी सावधानी बरती जाए। मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग और सैनेटाइजेशन को हर जगह अपनाया जाए। लेकिन सच यह है कि ज्यादातर जगहों पर लोग इसका पालन नहीं कर रहे हैं। अगर प्रयास किए जाएं, तो इसकी शुरुआत हमारे स्कूल ज्यादा अच्छी तरह से कर सकते हैं। स्कूलों को महामारी से लड़ने की पाठशाला बनाया जाए, तो इसका असर पूरे समाज पर दिख सकता है। पूरे देश में किशोर वय बच्चों को वैक्सीन भी लगने लगी है। यह काम स्कूलों में उसी तरह से किया जा सकता है, जैसे कभी हैजे और चेचक के मामले में किया जाता था। यह भी जरूरी है कि महामारी से लड़ाई को छोटे बच्चों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए। फिलहाल तो इतिहास विषय में भी इनके बारे में नहीं पढ़ाया जाता।


विजय गर्ग

 सेवानिवृत्त प्राध्यापक

 मलोट

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