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आभासी दुनिया के सबसे चर्चित मंच, फेसबुक से उपयोगकर्ताओं की बढ़ती दूरी

 आभासी दुनिया से जुड़े कई व्यावहारिक पहलू और जोखिम लोगों को यहां समय बिताने से रोक रहे हैं। साथ ही लोग आभासी लोकप्रियता से उपजी उलझनें और असलियत भी समझने लगे हैं। यह समझ और इस हकीकत की स्वीकार्यता दोनों ही जरूरी भी हैं, क्योंकि इस दुनिया में असीमित वक्त बिताने की आदत व्यक्तिगत दिनचर्या और आत्मानुशासन का मामला है।

आभासी दुनिया के सबसे चर्चित मंच, फेसबुक से उपयोगकर्ताओं की बढ़ती दूरी

हाल में चर्चित सोशल मीडिया मंच फेसबुक की कंपनी मेटा को अठारह सालों में पहली बार बड़ा नुकसान हुआ है। उसके सक्रिय प्रयोक्ताओं की संख्या में भी भारी गिरावट आई है। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक फेसबुक के सक्रिय उपयोगकर्ताओं के आंकड़े में अब तक वार्षिक चार प्रतिशत की बढ़ोतरी होती रही है। साथ ही अपनी विभिन्न कंपनियों से मिलने वाले विज्ञापनों से फेसबुक हर साल मोटा राजस्व कमाती आई है।

ऐसे में पिछली तिमाही से कंपनी को रोजाना के सक्रिय उपयोगकर्ताओं की संख्या में इजाफा होने की उम्मीद थी। लेकिन यह संख्या आशा के अनुरूप नहीं बढ़ पाई। इसके चलते कंपनी की कमाई प्रभावित हुई है, जो बीते साल की तुलना में आठ फीसद कम है। इसके लिए कंपनी ने नए सोशल मीडिया मंचों और उनके द्वारा दी जा रही सुविधाओं को जिम्मेदार माना है। एप्पल जैसी कंपनियों की निजता संरक्षण की नीति को भी अपने घटते कारोबार की वजह बताया है। इसलिए कि पूरी तरह लोगों की निजी जानकारियां साझा न करने के कारण यह नीति विज्ञापन दिखाने और कमाई करने में बाधा बन रही है।

दरअसल, आभासी दुनिया के सबसे चर्चित मंच, फेसबुक से उपयोगकर्ताओं की बढ़ती दूरी के कई कारण हैं। हालांकि कंपनी अपने आर्थिक लाभ में गिरावट को दूसरे मंचों द्वारा उपलब्ध कराई जा रही सुविधाओं की बढ़ती सूची और निजी जानकारियां साझा न करने की तकनीकी सेटिंग को ही इसकी वजह मान रही है, पर इसके पीछे सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और व्यक्तिगत कारणों की भी एक पूरी फेहरिस्त है।

निजता में सेंध लगाने से लेकर, बेवजह की असामाजिक व्यस्तता, आभासी सक्रियता से उपजा तनाव और वास्तविक जीवन के बजाय स्क्रीन में झांकते हुए बीतने वाले समय के बढ़ते घंटे भी उपयोगकर्ताओं को इससे दूर कर रहे हैं। अमेरिकी मनोवैज्ञानिक संगठन के मुताबिक फेसबुक इस्तेमाल करते हुए अन्य काम किए जाने पर इंसान की उत्पादकता चालीस प्रतिशत घट जाती है। ऐसे में व्यक्तिगत जीवन से लेकर कामकाजी मोर्चे तक, दुनिया के हर हिस्से में बसे लोग इस मायावी संसार में मौजूद रहने के कारण पैदा हो रहे जोखिमों और जद्दोजहद को समझ रहे हैं। नतीजतन, इस आभासी दुनिया से दूर भी छिटक रहे हैं।

बीते कुछ महीनों में उपयोगकर्ता यह महसूस कर पा रहे हैं कि मेटा कंपनी ने फिलहाल अपना ध्यान पूरी तरह विज्ञापन दिखाने पर केंद्रित किया हुआ है। इसके चलते इस मंच पर मौजूदगी दर्ज कराने वाले उपयोगकर्ताओं द्वारा साझा की जा रही सामग्री पूरी तरह उपेक्षित हो रही है। इतना ही नहीं, निजी जानकारियां साझा करने से लेकर नकारात्मक और नफरत फैलाने वाली सामग्री को विस्तार देने और मानव तस्करी की समस्या से जुड़े आरोप भी फेसबुक पर लगते रहे हैं। हमारे देश में तो यह माध्यम फर्जी खबरों और नकारात्मक टिप्पणियों के लिए भी खूब चर्चा में रहता है।

बड़ी संख्या में उपयोगकर्ता अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर विद्रूप परिवेश तैयार करने के लिए भी इस मंच का इस्तेमाल कर रहे हैं। तकलीफदेह क्षणों में भी यहां दिखता वैचारिक दुराग्रह असल दुनिया में भी सामाजिक-पारिवारिक माहौल में दिशाहीनता को बढ़ा रहा है। ऐसी बहुत-सी बातों की एक लंबी फेहरिस्त है, जो लोगों का भरोसा छीन रही है। नतीजतन, उपयोगकर्ता इस मंच से दूरी बना रहे हैं। हालांकि भारत में तो काफी समय से एक बड़ा वर्ग सोशल मीडिया से दूरी बनाने की ओर अग्रसर है। कुछ समय पहले आई डिजिटल मार्केटिंग कंपनी रिबूट आनलाइन के अध्ययन में सामने आया था कि हमारे यहां हर महीने करीब पांच लाख लोग सोशल मीडिया से दूरी बनाना चाहते हैं।

इसी के साथ एक पहलू यह भी है कि फेसबुक जैसे आभासी मंच समय लीलने का जरिया भी हैं। इस असामाजिक और दिखावटी-बनावटी दुनिया से दूर होने की एक बड़ी वजह यहां बीते रहे समय को बेहतर कामों में लगाने की समझ पैदा होना भी है। गौरतलब है कि बीते दो बरस में कोविड काल में बदली जीवनशैली ने स्क्रीन की दुनिया में लोगों की मौजूदगी का समय बहुत ज्यादा बढ़ा दिया था। स्कूल, दफ्तर का या दूसरी चीजों से जुड़ी सूचनाएं जुटाने का मामला हो या आम दिनचर्या से जुड़े अड़े अद्यतन साझा करने का व्यवहार, अभासी दुनिया दुनिया में लंबा वक्त बीत रहा था।

लेकिन अब आमजन यह जानने और मानने लगे हैं कि आवश्यकता हो या अवकाश, हरदम आनलाइन रहने की आदत कई व्याधियां भी पैदा करने लगी है। बीते दिनों आई लाइफलाक की नार्टन साइबर सेफ्टी-2021 इनसाइट रिपोर्ट के मुताबिक कोविड महामारी के कारण लगभग हर तीन में से दो यानी छियासठ फीसद लोगों को आनलाइन रहने की आदत लग गई है।

रिपोर्ट बताती है कि भारत में वयस्क काम या शैक्षणिक गतिविधियों के बजाय औसतन प्रतिदिन 4.4 घंटे स्क्रीन के सामने बिता रहे हैं। साथ ही दस में से आठ यानी बयासी फीसद लोगों ने माना कि वे कोरोना महामारी के दौरान शिक्षा या काम के अलावा भी फोन पर ज्यादा समय बिता रहे हैं। इस अध्ययन में बहत्तर फीसद भारतीय वयस्कों ने माना कि स्क्रीन के सामने ज्यादा समय बिताने से उनके शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ रहा है। वहीं पचपन फीसद लोगों का कहना है कि इससे मानसिक स्वास्थ्य भी बहुत प्रभावित हुआ है।

यूके के फीलगुड कांटेक्ट के आंकड़ों के अनुसार कोरोना काल में भारत में स्क्रीन टाइम की बढ़ोतरी और नजर की कमजोरी में गहरा संबंध देखा गया है। आंखों की रोशनी कम होने और नजर खराब होने की शिकायत के मामले में भारत दुनिया की सूची में सबसे पहले स्थान पर आ गया है। करीब 27.5 करोड़ भारतीय यानी हमारी आबादी का करीब तेईस प्रतिशत हिस्सा बहुत ज्यादा स्क्रीन टाइम की वजह से नजर की कमजोरी से जूझ रहा है। गौरतलब है कि फीलगुड कांटेक्ट ने ये आंकड़े लैंसेट ग्लोबल हेल्थ, डब्लूएचओ और स्क्रीनटाइम ट्रेकर डाटा रिपोर्टल के माध्यम से जुटाए हैं।

दरअसल, आभासी दुनिया से जुड़े कई व्यावहारिक पहलू और जोखिम लोगों को यहां समय बिताने से रोक रहे हैं। साथ ही लोग आभासी लोकप्रियता से उपजी उलझनें और असलियत भी समझने लगे हैं। यह समझ और इस हकीकत की स्वीकर्यता दोनों ही जरूरी भी हैं, क्योंकि इस दुनिया में असीमित वक्त बिताने की आदत व्यक्तिगत दिनचर्या और आत्मानुशासन का मामला है। हर आयु वर्ग के लोगों में आन-स्क्रीन और आफ-स्क्रीन समय के बीच एक स्वस्थ संतुलन बना रहे तो आभासी सामाजिकता और असल दुनिया के जुड़ाव में संतुलन भी बना रहता है।

हार्वर्ड विश्वविद्यालय की एक रिपोर्ट के अनुसार शुरुआत में लोग संपर्क बढ़ाने और दुनिया भर के लोगों से जुड़ने के लिए सोशल मीडिया मंचों से जुड़े थे। लेकिन धीरे-धीरे अपने ही जीवन से दूर होने लगे। खुद की जिंदगी से ही बढ़ रही दूरी के खमियाजे अब गहराई से महसूस किए जाने लगे हैं। असल में देखा जाए तो वाकई आभासी मंचों ने लोगों को वास्तविक जीवन से दूर ही किया है। ऐसे में जब आभासी पटल पर जुड़े लोगों तक भी एक-दूसरे के पोस्ट, नोटिफिकेशन और जानकारियां नहीं पहुंच रहे हैं, तो यह मोहभंग लाजिमी है।

दुनिया भर के लाखों उपयोगकर्ता लंबे समय से यह शिकायत कर रहे हैं कि फेसबुक ने उनके द्वारा साझा की जा रही सामग्री की पहुंच काफी हद तक घटा दी है। यही वजह है कि हाल की रिपोर्ट के मुताबिक 2004 में फेसबुक की शुरुआत के बाद यह पहला मौका है, जब उपयोगकर्ताओं की संख्या और कंपनी की कमाई दोनों घटे हैं। सुखद यह है कि इस कमी के पीछे मौजूद बहुत से कारणों की सूची में लोगों का वास्तविक जीवन की ओर मुड़ना भी एक अहम कारण है।



विजय गर्ग 

सेवानिवृत्त प्राचार्य 

मलोट

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