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आर्थिक तंगी का फंदा

 आमतौर पर यही माना जाता है कि कोई व्यक्ति अतिशय भावनात्मक दबाव की हालत में कई बार खुद को नहीं संभाल पाता है और मौत को गले लगा लेता है। ऐसी मौतों को अक्सर प्रत्यक्ष कारणों के नतीजे तक सीमित करके देखा जाता रहा है। लेकिन अगर आत्महत्या की घटनाओं में अप्रत्याशित बढ़ोतरी होने लगे तो यह किसी के लिए भी चिंता की बात होनी चाहिए। खासकर तब जब किसी व्यक्ति को सरकारी नीतियों से उपजे हालात की वजह से खुदकुशी करने के अलावा कोई विकल्प दिखना बंद हो जाता है।

आर्थिक तंगी का फंदा

यों अभाव या अन्य कई वजहों से लोगों की खुदकुशी की घटनाएं नई नहीं हैं और खासकर पिछले कई सालों से कर्ज में डूबे किसानों की भारी तादाद में आत्महत्या के आंकड़ों ने इस समस्या के व्यापक परिप्रेक्ष्य पर सोचने पर मजबूर किया है। इसके बावजूद सरकार की ओर से ऐसी नीतियां बनाने की दिशा में कोई ईमानदार पहल नहीं हुई, ताकि किसी व्यक्ति के सामने खुदकुशी की नौबत न आए। यह बेवजह नहीं है कि आज आर्थिक तंगी का फंदा इस कदर कस रहा है कि कई लोग अपने जीवन से हार जा रहे हैं।

इस मसले पर बुधवार को संसद में सरकार ने जो तस्वीर पेश की, वह यह बताने के लिए काफी है कि जिस क्षेत्र में सरकार नीतिगत और अमल के स्तर पर कुछ ठोस कदम उठा कर आत्महत्या के जटिल मसले का हल निकाल सकती थी या इसकी तीव्रता कम कर सकती थी, उसमें भी कुछ नहीं किया गया। बल्कि पिछले दो-ढाई सालों के दौरान महामारी या अन्य कई वजहों से कर्ज और बेरोजगारी का जो संजाल खड़ा हुआ, उसमें फंसे बहुत सारे लोगों का धीरज जवाब दे गया।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के हवाले से केंद्रीय गृह राज्यमंत्री ने राज्यसभा में बताया कि बीते तीन सालों के दौरान बेरोजगारी और कर्ज में डूबे होने की वजह से पच्चीस हजार से ऊपर लोगों ने आत्महत्या कर ली। इस आंकड़े के मुताबिक, बेरोजगारी से जूझते हुए करीब नौ हजार और कर्ज के दुश्चक्र में फंस कर दिवालिया हो जाने की वजह से सोलह हजार से ऊपर लोगों ने जान दे दी। पिछले दो सालों में कुल आत्महत्या करने वाले लोगों की कुल संख्या करीब तीन लाख थी।

गौरतलब है कि कोरोना के मद्देनजर सरकार ने पूर्णबंदी लगा दी थी, जो अब भी कई जगहों पर समय-समय पर लगाई जाती है। इसका सबसे ज्यादा असर वैसे लोगों पर पड़ा जो अपने गुजारे के लिए दिहाड़ी या फिर नौकरी पर निर्भर हैं। जिन करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी छिन गई, उनमें बहुतों के सामने जिंदा रहने के लिए न्यूनतम खर्च हासिल कर पाना भी मुमकिन नहीं रहा।

इसी तरह बहुत सारे लोग कर्ज के जाल में फंसे और इसके बाद आमदनी बंद होने के चलते उसे चुकाने लायक नहीं रहे। सिर्फ इन दो वजहों से पैदा मजबूरी और फिर दबाव को पच्चीस हजार से ज्यादा लोग सह नहीं सके और खुदकुशी को हल मान लिया। निश्चित रूप से आत्महत्या किसी भी हाल में समस्या का हल नहीं हो सकती। पीड़ित व्यक्ति की स्थिति और उससे उपजे दबाव के समांतर व्यवस्थागत स्तर पर इसके कारणों का विस्तार सरकार की रीति-नीतियों तक होता है। सच यह है कि आत्महत्या ऐसी मौतें हैं, जिनसे बचा जा सकता है। लेकिन यह सरकार की दृष्टि और इच्छाशक्ति पर निर्भर है कि वह किस तरह की सामाजिक विकास नीतियों पर अमल करती है


विजय गर्ग

 सेवानिवृत्त प्राचार्य 

मलोट पंजाब

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