Type Here to Get Search Results !

रोजगार के लिए गांवों से लोगों का शहरों में पलायन होता रहा है

 आजादी के पहले से ही रोजी-रोजगार के लिए गांवों से लोगों का शहरों में पलायन होता रहा है। आज की तरह जब सरकारी नौकरियां सीमित थीं, लोग-बाग अपनी योग्यता के अनुसार परदेस जाकर परिवार के भरण-पोषण की व्यवस्था कर लिया करते थे। आज के विकसित मेट्रो महानगरों में मुंबई, कोलकाता, दिल्ली और चेन्नई कभी रोजगार के प्रमुख केंद्र हुआ करते थे, लेकिन इन चार महानगरों में सबसे प्रमुख था कलकत्ता। कलकत्ता कल-कारखाने के लिए विख्यात था ही, वहां कम खर्च में गुजर-बसर हो जाता था।

रोजगार के लिए गांवों से लोगों का शहरों में पलायन होता रहा है।

वहां उत्तर प्रदेश, बिहार ओड़ीशा और मध्यप्रदेश के लोग रोजी-रोटी के जुगाड़ में जाया करते थे। कभी इन राज्यों के हर गांव से आमतौर पर एक-दो लोग अवश्य कलकत्ता रहा करते थे। शुरू में जो लोग इस नगर की आबो-हवा में घुल-मिल जाते थे, वे धीरे-धीरे अपने रिश्तेदारों के भी कमाने-खाने के जुगाड़ बिठा दिया करते थे। चूंकि, तत्कालीन कलकत्ता एक प्रमुख औद्योगिक महानगर हुआ करता था, जहां अकुशल श्रेणी के व्यक्तियों के जीवन-यापन का अधिक आकर्षण हुआ करता था, जबकि निजी कंपनियां, बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में भी लोग नौकरी पाकर अपने परिवार के लिए भरण-पोषण का स्रोत ढूंढ़ लिया करते थे।

कलकत्ता में रहने वाले ग्रामीण क्षेत्र के ऐसे व्यक्तियों को ‘कलकतिया’ के नाम से जाना जाता था। इस महानगर के किसी भी क्षेत्र में नौकरी-पेशा करने वाले ये लोग समूह में आवासन, भोजन की व्यवस्था किया करते थे। ‘मेस’ के रूप में सामूहिक भोजनालय की व्यवस्था से इन्हें भोजन पर कम व्यय करना पड़ता था और किसी के बीमार पड़ने पर उन्हें समुचित देखभाल की सामूहिक जिम्मेवारी भी वहन करनी होती थी।

चूंकि ये प्रवासी लोग बिना परिवार के वहां रहा करते थे, सो वे सामान्य रूप से होली, दशहरे की छुट्टी में घर आते थे। कलकतिया का जब गांव आना होता था, उसकी सूचना उनके साथ रहने वाले समूह सदस्यों तथा गांव-घर के लोगों को भी हुआ करती थी। गांव से घरेलू सामग्री यथा रसोईघर का सामान, बिस्कुट, फल, कपड़े-लत्ते, खिलौने, घर खर्चे के रुपए की मांग ‘कमासुत प्राणी’ को पत्र द्वारा संदेश भेज कर की जाती थी।

आज भी स्मरण है कि कलकत्ता में रह रहे पिता जी को सादे कागज पर पैर का नाप भेज कर उनसे चप्पल-जूते भेजने की फरमाइश की जाती थी। हाथी, घोड़े़, ऊंट, शेर की आकृति के बने बिस्कुट जब पिता जी किसी से भेजते थे, तो हम भाई-बहनों में उनके लिए छीना-झपटी हुआ करती थी। वर्ष में एक या दो बार जब भी पिता जी कलकत्ता से आते, तो मन में आने वाली अनेक सौगातों की उत्सुकता बनी रहती थी। बचपन का वह कौतूहल आज शहर के माल या आनलाइन खरीदे गए सामान में तनिक भी नहीं दिखता, क्योंकि उन दिनों कम चीजों का सुख और संतोष आज बाजारवाद की बहुलता की भेंट चढ़ गया दिखता है।

कभी कलकतिया की पहचान गांव में एक विशिष्ट स्थान रखता था। जितने दिनों के लिए वे घर आते थे उनका सामाजिक सरोकार अत्यंत आत्मिक भाव से ओत-प्रोत हुआ करता था। सुबह-शाम टोले-मुहल्ले का जमघट बना रहता था। गांव के वरिष्ठ लोगों से स्वयं वे जाकर मिलते, गपियाते और स्नेहिल संबंधों के तार को मजबूती प्रदान करते थे। कलकतिया के वापस जाते समय गांव के उनके साथ वहां रहने वालों के लिए घर का बना कुछ नमकीन, ठेकुआ जैसे व्यंजन छोटी पोटली में पैक कर पत्र के साथ जरूर भेजा जाता था।

चूंकि रेल परिवहन ही मुख्य साधन था गांव से कलकता आने-जाने का, इसलिए जिस प्रकार आने वाले कलकतिया को गांव-घर के एक दो लोग स्टेशन उन्हें लाने जाया करते थे, ठीक उसी प्रकार उनकी वापसी के समय भी लोग उन्हें स्टेशन विदा करने जरूर जाया करते थे। बुजुर्ग कहा करते थे कि जब देश में रेल नहीं चली थी, उस समय अत्यंत सीमित संख्या में भी नौकरी करने लोग कलकत्ता महीनों की थकाऊ पैदल यात्रा करके जाया करते थे।

आज जब औद्योगिक स्वरूप से अलग होकर कलकत्ता अपने अतीत के वैभव से बिखर चुका है, जाहिर है कि परदेसी कलकतिया भी अपने अस्तित्व को विस्मृत कर रहा है। परदेसी का हृदय और मस्तिष्क सदैव पारिवारिक हित के साथ सामाजिक ताने-बाने को जीवंत रखने में दिलो-जान से एक प्रतीक के रूप में मान्य था, आज भौतिक सुख की असीमित अंगड़ाई ले रहा है।

न्यूनतम साधन में अपना और परिवार का गुजारा अपने समस्त मनोरथ को संतुष्टि के सागर से वे पूर्ण करते थे। पारंपरिक लोक संस्कृति के ये आयाम अब दुर्लभ हैं, लेकिन बीते कल के इस गौरवपूर्ण सामाजिक पहचान को स्मरण कर वर्तमान और भावी जीवन के पथ पर पड़े असंतोष और अवसाद रूपी कुछ कांटों को हम हटा तो अवश्य सकते हैं। चूंकि परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत चक्र है, इसलिए आज लुप्त हो रहे परदेशी कलकतिया को स्मरण कर हम कुछ पल के लिए अंतर्मन में गुदगुदी अवश्य पैदा कर सकते हैं।

रोजगार के लिए गांवों से लोगों का शहरों में पलायन होता रहा है।

विजय गर्ग 

सेवानिवृत्त प्राचार्य

 मलोट

Post a Comment

0 Comments
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.