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ट्रेन का सफर (कहानी)

ट्रेन का सफर (कहानी)

 इस बार सिर्फ जाना था, शायद पहुंचना कहीं नहींं था, जैसे पहले हम पापा के पास, भाभियों के पास पंहुच जाते थे। वातावरण में हल्की ठंडी हवा थी, स्टेशन के रास्ते में टेबुबुइया के फूल पूरे समय दिखते रहे, झरते रहे। इन्हें देख कर पहले जितनी खुशी और उत्साह होता था, इस बार नहीं है। आरक्षण करवाने के बाद भी डिब्बे में बहुत भीड़ थी। यात्रियों को सामान्य टिकट नहीं मिल रही थी, फिर भी जाना तो था, बिना टिकट ही सही। सो, जहां जगह मिली, लोग बैठे हुए थे। सफर में हम दोनों भी क्या बात करते, चुपचाप एक-दूसरे को ताक रहे थे। चलते समय का थोड़ा हो-हल्ला होने के बाद गाड़ी स्टेशन से सरकने लगी थी।

थोड़ी देर बाद एक महिला की सिसकियों की आवाज पर ध्यान गया। वह लगभग चालीस बरस की रही होगी। मालूम हुआ कि डिब्बे में अधिकतर लोग गमी की होली के लिए अपनों के घर जा रहे थे, जिनसे बीते दो साल नहीं मिल पाए। एक के पति गुजर गए, किसी का दामाद नहीं रहा, रिश्तों के जितने भी नाम हो सकते थे, जो अब किसी न किसी के नहीं रहे। बेटी, दामाद, मां, पिताजी, मामा, बुआ, चाचा…। लग रहा था, पूरी ट्रेन ही सिसकियों से भर कर जा रही थी। किसी को भी अपने गन्तव्य पर पहुंचने का कोई उत्साह नहीं। आंसुओं से लदी इस रेलगाड़ी की रफ्तार भी बहुत सुस्त थी। ट्रेन की खिड़की से दिखते टेसू के फूल और बौराए आम के लिए मन में कोई भाव नहीं था।

इतने में हाल में नौकरी पर लगा एक नौजवान टीटी आया। ट्रेन में मासिक पास नहीं बनने से अप-डाउन करने वाले बिना टिकट जा रहे थे। टीटी ने उन्हें चेताया- अगली बार इस डिब्बे में दिख मत जाना। इशारे से अगले यात्री से पूछता है- टिकट। वह महिला बोलती है, मुझे किसी भी तरह ससुराल पंहुचना ही है। ट्रेन का समय हो गया था, खिड़की से टिकट नहीं मिल रहा था, आप टिकट यहीं बना दो। पेनाल्टी के साथ टिकट बनाने के लिए चार सौ रुपए देना होगा, इससे कम का तो टिकट नहीं बनता। महिला ने कहा, मेरे पास तो डेढ़ सौ ही हैं, मैं सच कह रही हूं। मेरे बेटे की पहली होली में मुझे जाना ही है।

टीटी ने थोड़ा सोचा और पचास रुपए वापस कर कहा कि, मैं किसी और के साथ आपका टिकट बना दूंगा, और वह आगे बढ़ गया। पास बैठे एक रिटायर्ड पुलिस वाले ने पूछा कि यह शिष्टाचार है या भ्रष्टाचार। महिला ने कहा कि वह आरक्षण नहीं करा सकी, लेकिन जाना तो है ही। बता रही थी कि कैसे बीते दो साल। उसने बेटे की अस्पताल में देखरेख की, पर वह बहुत दूर चला गया। इस बार उसकी पहली होली थी। उस बुजुर्ग पुलिसवाले ने कहा कि टीटी की भलमनसाहत है कि उसने केवल जनरल टिकट जितना पैसा लिया, वरना कौन टीटी ऐसा करता।

दो जवान लड़कियों ने कहा कि हमसे सख्ती करता, तो हम बताते। हम लोगों ने तो पहले टीटी को पीटा भी है। आगे वाले डिब्बे में और भी अप-डाउन करने वाले बैठे हैं। मासिक पास बन नहीं रहा, तो हम क्या करें। तीन-चार उजड्ड से लड़कों में से एक सिगरेट पी रहा था। उस महिला ने कहा कि यहां सिगरेट मत पीओ, तो कहा कि मैं तो दस साल की उम्र से पी रहा हूं, मेरा बाप भी मुझको मना नहीं करता।

उस महिला की आंखें फिर आंसुओं से भर गर्इं। उसने हाथ जोड़ कर कहा, बेटा तुम्हारी उम्र का मेरा बच्चा अभी चार महीने पहले कैंसर से नहीं रहा। तुम कल्पना भी नहीं कर सकते कि कैंसर क्या होता है। अब वह लड़का कुछ बोलने की स्थिति में नहीं था। चलती ट्रेन में फसल कट चुके खाली खेत दिख रहे थे। उनके कारण भी माहौल में एक तरह का सन्नाटा था। शाम ढलने लगी और चांद पूरा और उदास था, हम सब सिसकियों के हमसफर थे।

उस नौजवान टीटी से बातें करने की गरज से अगले डिब्बे में पहुंचा, तो वह बेटिकट यात्रियों के टिकट बनाने में व्यस्त था। थोड़ा मौका मिलते ही कहा कि आप जानते नहीं कि आपने उस महिला की कितनी बड़ी मदद की। सचमुच उसका नौजवान बच्चा नहीं रहा, उसको जाना भी था। मैं आपको शुक्रिया कहना चाहता हूं। आपको मालूम नहीं कि आपको कितनी दुआएं मिल रही हैं। ट्रेन धीमी रफ्तार से चलती रही, पर बहुत मन में अजीब-सी स्थिरता रही। किसी स्टेशन पर ट्रेन रुकने पर कुछ और लोग चढ़ते, उतरता कोई नहीं।

वह नौजवान टीटी एक बार फिर आया। उस महिला से कहा कि आप टिकट नहीं बुक करवा सकीं थी न, आप यह रखिए। उसने सौ रुपए का नोट उस महिला को वापस कर कुछ सुने बिना आगे निकल गया। हम सब हतप्रभ थे। इस बार हमारी आंखों में नमी उन खोए हुए लोगों के लिए नहीं थी।

विजय गर्ग मलोट


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