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दर्द भरे अहसास

दर्द भरे अहसास

 आमतौर से भारतीय नाटकों और फिल्मों के अनुसार यदि दीया बुझ गया तो पति लुढ़क गया और अगर पूजा की थाली गिर गई तो समझो पति का एक्सीडेंट हो गया। पर आजकल जो फिल्म चर्चा में है उसमें दिया बुझा है न थाली गिरी है बल्कि मानवता की मशाल बुझी हुई दिख रही है और थाली की जगह लगता है कि सारे ही बर्तन लुढ़ककर किसी घाटी से गहरे अपशकुन की सूचना दे रहे हैं। मेरा इशारा कश्मीर फाइल्स की तरफ है।

पूरी दुनिया में ईश्वर व अल्लाह के नाम पर जितनी झूठी कसमें खाई जाती हैं उनसे तो यही लगता है कि ईश्वर ने इंसान से नज़र फेर ली है। शायद इसीलिये किसी को कोई डर-भय नहीं है और इसी कारण कश्मीर में रातोंरात लाखों लोगों को बेघर कर दिया गया। बच्चों का दमन किया गया और महिलाओं की आबरू से खिलवाड़ किया गया। सदियों से ऐसा ही होता आया है। हैरानी तो इस बात की है कि इतनी बड़ी घटना का किसी कोर्ट और राजनीतिक दल ने संज्ञान ही नहीं लिया। वीभत्स नरसंहार और इतने बड़े पलायन से पनपे आंसुओं के सैलाब भी नीति-नियंताओं की रूह में आर्द्रता पैदा नहीं कर सके। न ही सामाजिक कार्यकर्ताओं के खून में उबाल आया। यूक्रेन से अपनी संतानों को निकालने में हुई जरा-सी देरी या लापरवाही के फलस्वरूप अभिभावक खूब भड़के और सुरक्षित पहुंच चुके विद्यार्थियों ने मंत्रियों का अभिवादन तक लेने से परहेज किया। तो सोचने की बात है कि जो लाखों लोग कश्मीर से निकाले जाने के 32 साल बाद तक शरणार्थी शिविरों में बेबसी की हालत में हैं, उनके प्रति कोई क्यों नहीं भड़का? ‘कश्मीर फाइल्स’ फिल्म ने इतिहास के सत्य से जो नकाब उठाया है, उसने कइयों को हिला कर रख दिया है और कइयों की पोल खोल दी है। दर्द के दरिया में डूबे लाखों लोगों की हालत पर इतिहास ने चाहे धूल फेंकने की कोशिश की हो पर सत्य अपना रास्ता निकाल ही लेता है। यही कारण है कि लाखों कश्मीरी पंडितों की हालत पर लाखों सवालिया निशान फुफकारते शेषनागों की तरह उठ खड़े हुये हैं। कोई है जो जवाब देगा।

जैसे नकली शहद से चिपट कर मधुमक्खी चल नहीं पाती और असली में आराम से चल सकती है, वैसे ही मिलावटी मानवता ने लोगों का जीना हराम कर रखा है।

विजय गर्ग मलोट


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