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विचारों का गिरना

 प्रकृति ने एक बार फिर करवट बदली है। अब उसने राग पतझड़ शुरू कर दिया है। जो प्रकृति के संगीत से जुड़े हैं, उनके लिए यह समझना आसान हो सकता है कि राग पतझड़ का संगीत में कोई अस्तित्व भले न हो, पर जीवन में अवश्य है। यह सभी के जीवन में अपना प्रभाव दिखाता है। यह वह राग है, जो विदाई के समय छेड़ा जाता है। विदाई व्यक्ति की नहीं, उसके बुरे कर्मों, बुरे विचारों की। ऐसे बहुत से लोग हैं, जिनके जीवन में यह राग सदा बजता रहा है। पर कई ऐसे भी होते हैं, जो इसमें जीवन का आशय ढूंढ़ते हैं। इसमें आधा सफल होने वाले इंसान ही रह पाते हैं और जो इसमें जीवन का पूरा आशय ढूंढ़ लेते हैं, वे महात्मा बन जाते हैं।

दिन की धूप तीखी होती जा रही है। हवाएं तेज चलने लगी हैं, पत्तों की सरसराहट भी कुछ परिवर्तन का आभास देती है। बंद खिड़की के पास सोने से हवा की सायं-सायं भी कुछ नएपन का संकेत देने लगी है। इन सबका आशय यही है कि प्रकृति अपना बाना बदलने लगी है। मानवी भाषा में कहा जा सकता है कि प्रकृति अपना चोला बदलने लगी है। पर प्रकृति के इस परिवर्तन पर अगर थोड़ा-सा ध्यान दिया जाए, तो हम समझेंगे कि यह प्रकृति के विश्राम का क्षण है। कुछ नया करने के पहले इंसान भी कुछ सोचता है। प्रकृति भी इस प्रयास में है, क्योंकि उसके पास अब भी हमें देने के लिए बहुत कुछ है। अब यह मानव पर निर्भर है कि वह क्या ले, कितना ले?

कभी सूर्योदय से पहले निहारा है प्रकृति को? एक बार देखो इसकी अद्भुत छटा। चिड़ियों की चहचहाट, मंद-मंद बहता समीर, आकाश की लालिमा, मानो सूरज ने घूंघट ओढ़ रखा हो। किसी बाग-बगीचे में कसरत करते युवा, बतियाते या तेज चलते बुजुर्ग, दौड़ते-भागते शोर करते बच्चे। इनमें से हर कोई यही चाहता है कि आज प्रकृति के साथ जीभर कर खेल लो, क्या पता कल यही हमसे रूठ जाए। कभी इनसे बात करके देखो, भविष्य के सपने कैसे झांकते हैं इनकी बातों में।

पतझड़ एक विचार है, समय का, परिवर्तन का, जीवन का, संघर्ष का। वनस्पति शास्त्री कहते हैं, पतझड़ के इस समय पेड़ों के भीतर एक वलय बन जाता है। इसी वलय को गिन कर पेड़ की उम्र का पता लगाया जाता है। जितने वलय, उतने वर्ष। जब पेड़ से पूरे पत्ते उससे नाता तोड़ लेते हैं, तब पेड़ कितना कुरूप दिखाई देता है। लोग उसकी ओर देख कर आहें भरते हैं कि कभी यह भी हरियाला था। इसके पत्तों की सरसराहट कितनी भली लगती थी। इसकी छांव में हमने खूब मौज-मस्ती की है। पर अब इसमें वह बात कहां?

पेड़ पर इस तरह के कटाक्ष करने वालो, थोड़ा ठहर जाओ। अभी यह पेड़ अपने बाहरी विश्राम के क्षणों में है। इसने तुम्हें सीख देने के लिए पत्तों को अपने से दूर किया है। आज आपके सामने यह निर्वस्त्र दिखाई दे गया तो आपने जरा भी देर नहीं की। अभी तो आपने इसका बाहरी स्वरूप ही देखा है। कुछ दिन बाद ही इसमें नए पत्तों की कोंपल फूटेगी, तब देखना। कोमल, नरम, मुलायम पत्तों की बहार। ये आते रहेंगे पूरी मस्ती के साथ, तुम्हें पता भी नहीं चलेगा कि कब यह पेड़ पूरी तरह से हरियाली से ढंक गया।

अब भी पतझड़ आ रहा है, पर वह है मानव के गिरते विचारों का पतझड़। विचार ऐसे, जिसमें देश, मान-अभिमान, प्रतिष्ठा, परोपकार, गर्व आदि कुछ नहीं। अगर है, तो केवल स्वार्थ, धन-लिप्सा, मक्कारी, धूर्तता, बेईमानी, झूठ-फरेब, लूट-खसोट आदि कूट-कूट कर भरी है। इन कुसंगियों के बीच रह कर वह कुछ भी कर रहा है। अब पेड़ तो हैं नहीं, इसलिए इस पतझड़ में मनुष्य के विचार गिरने लगे हैं। विचारों का गिरना लगातार जारी है। अब तो इसे पतझड़ की भी प्रतीक्षा नहीं होती। प्रकृति से दूर होने के कारण उसका स्वभाव भी भूल गया है।

इस मौसम के बाद पेड़ों की रंगत ही बदल जाती है, पर इंसान की नहीं बदलती। उसने अपने आपको पुराने विचारों के साथ इस तरह जकड़ लिया है कि नए विचारों का प्रवेश ही बंद हो गया है। जब तक पुराने विचारों का खात्मा नहीं होगा, तब तक नए विचार आएंगे, यह सोचना भी गलत है। निर्माण सदैव विध्वंस के रास्ते आता है। इसे सभी समझते हैं, पर पुराना हटाना नहीं चाहते, तो नए विचार कैसे आएंगे?

पतझड़ में संदेश है, नई ऊर्जा का, जो प्राणों का संचार करती है। हृदय में उमंग और उत्साह भरती है। प्रकृति का गुनगुनाना जानने-समझने के लिए अब हमें शहर से दूर जाना पड़ता है। उसके लिए कभी समय निकाल ही लेंगे, पर पुराने और गंदे विचारों को भीतर से निकालने का कोई उपाय हमसे नहीं होता। हमें विचारों से भी हरियाला बनना है, तो प्रकृति से सीखना ही होगा। तब नहीं आ पाएगा हमारे आंगन में गिरते विचारों का पतझड़।

विजय गर्ग मलोट



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