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पानी से घिरी धरती पर पानी की कमी

पानी से घिरी धरती पर पानी की कमी

 बारिश के रूप में इतना पानी बरस जाता है कि उससे कई पृथ्वी के लोगों की प्यास और जल जरूरतें पूरी की जा सकती है। लेकिन पिछली सदी से हम लोगों ने धरती के भीतर मौजूद इस संसाधन का इतना दोहन किया कि उसकी मात्रा संकुचित होती चली गई। बदले में बारिश से धरती पर आए पानी को उसकी कोख तक पहुंचाने में भी विफल रहे। एक तो करेला दूजे नीम चढ़ा। धरती पर मौजूद ज्यादातर जलस्नोत ताल, तलैया, पोखर, झील और छोटी सहायक नदियों का अस्तित्व खत्म होता जा रहा है। पहले बारिश का पानी इन्हीं जलस्नोतों में जमा होकर सालभर धरती की कोख में रिस-रिसकर जाता रहता था और भूजल स्तर को ऊपर करने के साथ उसे निर्मल भी बनाता रहता था। अब न वे जलस्नोत रहे और धरती के एक बड़े हिस्से का क्रीटीकरण भी हो चुका है जो भूजल के स्वत: रिचार्ज होने की प्रक्रिया के आड़े आता है। लिहाजा कम जमा और ज्यादा निकासी के चलते भूजल की स्थिति गंभीर बन चली है।

पानी से घिरी धरती पर पानी की कमी: पृथ्वी के दो तिहाई हिस्से पर पानी होने के बावजूद पानी की कमी की बात कई बार अविश्वसनीय लगने लगती है। इसका कारण है कि पृथ्वी पर उपलब्ध पानी का ज्यादातर हिस्सा नमकीन है और उसे पीने या अन्य गतिविधियों में प्रयोग नहीं किया जा सकता है। यह भी समझें : पानी एक नवीकरणीय स्रोत है। वाष्पीकरण और बारिश के चक्र के माध्यम से पृथ्वी पर उपलब्ध कुल जल खत्म नहीं होता। इसलिए खतरा इस बात का नहीं है कि पृथ्वी पर पानी खत्म हो जाएगा। खतरा यह है कि हमारी जरूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त साफ पानी होगा या नहीं।

लापरवाही है बड़ा कारण: साफ पानी की कमी में कुछ योगदान जलवायु परिवर्तन के कारण आए बदलावों का है। लेकिन इसमें बड़ी हिस्सेदारी हमारी लापरवाही की है। भूजल का जरूरत से ज्यादा दोहन, नदियों व तालाबों को सूखने देना और साफ पानी के अन्य स्रोतों को इतना प्रदूषित कर देना कि उनका इस्तेमाल ही न किया जा सके।

बढ़ता संकट: नीदरलैंड्स की यूनिवर्सिटी आफ ट्वेंटे के 2016 के एक अध्ययन के मुताबिक, आने वाले समय में दुनिया की करीब चार अरब आबादी को साल में कम से कम एक महीने पानी की गंभीर कमी का सामना करना पड़ेगा। देखा जाए तो कई देशों में ऐसी स्थिति आने भी लगी है।

पृथ्वी पर उपलब्ध कुल मात्रा में से बस इतना ही ताजा पानी है। इसमें से भी दो तिहाई हिस्सा ग्लेशियर और बर्फीली चोटियों के रूप में है। यानी मनुष्य के खाने, पीने, खेती व अन्य कार्यों के लिए उपलब्ध ताजा पानी बमुश्किल एक प्रतिशत है।

परंपरागत जलस्रोतों को नष्ट  होने से बचाना

अपनी जल संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मनुष्य आज भी या तो प्रकृति पर निर्भर है या भूजल पर। ऐसे में जरूरी है कि हम प्राकृतिक जल भंडारण के स्रोतों के संरक्षण के प्रति संवेदनशील होते। लेकिन हमने परंपरागत जल स्रोतों के साथ बहुत सौतेला और स्वार्थ भरा बर्ताव किया। पुराने तालाबों, कुंओं, झीलों, बावड़ियों और कुंडों को उपेक्षित छोड़ दिया। नदियों को प्रदूषित कर दिया।

इस बार संयुक्त राष्ट्र ने विश्व जल दिवस की विषय वस्तु के रूप में भूगर्भीय जल को चुना है। यानी इस वर्ष दुनिया भर में भूगर्भीय जल को बचाने और उसका स्तर बढ़ाने के लिए विभिन्न उपाय करने के संदर्भ में लोगों को जागरूक बनाने के प्रयास किए जाएंगे। यह महत्त्वपूर्ण है कि भूगर्भीय जल पृथ्वी पर मानव जीवन की जरूरतों का सबसे बड़ा सहारा है।

जब बरसाती बादल किसी कारण से रूठ जाते हैं तो भूगर्भीय जल ही मानव की जरूरतों को पूरा करता है। दुर्भाग्य से दुनिया में आधुनिक जीवनशैली ने भूगर्भीय जल के दोहन को तो बेलगाम तरीके से बढ़ा दिया है, लेकिन उन तमाम जल संसाधनों के संरक्षण के प्रति भी उदासीन कर दिया है जो भूगर्भीय जल का स्तर बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। भारत में तो इस संदर्भ में कुंओं, तालाबों और जोहड़ों का विशेष योगदान था, जो वर्षा जल संग्रहित करके रखते थे और इस तरह इलाके के भूगर्भ जल स्तर को बनाए रखने में मदद करते थे।

राजस्थान के मरुस्थलीय इलाकों में इतने गहरे कुंए पाए जाते हैं कि उन्हें पातालतोड़ कुंआ कहा जाता है। दुर्भाग्य से जिन इलाकों में नलों के माध्यम से पानी पहुंच गया, वहां नागरिक और प्रशासन दोनों प्राचीन जल संसाधनों के संरक्षण के प्रति उदासीन हो गए। रही-सही कसर पूरी कर दी बिना नियंत्रण के खुदते नलकूपों ने, जो धरती के अंदर का पानी तो बाहर उलीच देते हैं, लेकिन धरती के अंदर पानी का स्तर बचाए रखने में कोई भूमिका नहीं निभा पाते। मिसाल के तौर पर, कुछ समय पहले राजस्थान सरकार ने शहरी क्षेत्रों में भी भूगर्भीय जल के दोहन की प्रक्रिया प्रारंभ करने के पूर्व स्वीकृति के उपबंध को समाप्त कर दिया।

इससे जगह-जगह जमीन में नलकूप खोदने और अनियंत्रित तरीके से कुंए खोदने का काम शुरू हो गया। जो लोग मानवता के भविष्य के लिए जल संरक्षण के प्रति प्रतिबद्ध हैं, उन्हें यह स्थिति डराती है क्योंकि भूगर्भीय जल के अनियंत्रित दोहन ने प्रदेश के बहुत सारे हिस्सों में पहले ही उपलब्ध जल भंडारण की स्थिति को भयावह कर दिया है।

हर साल गर्मी के मौसम में देश के विविध हिस्सों से जल-संकट की विविध डरावनी तस्वीरें सामने आती हैं। साल 2020 और 2021 में जल-संकट की चर्चा कम रही, क्योंकि सारी मनुष्यता के सामने कोरोना महामारी का संकट था। वरना याद करिए कि उसके पिछले वर्षों में शिमला में लोगों ने जल संकट के कारण पर्यटकों की आवाजाही भी बंद करने की अपील की थी और चेन्नई जैसे महानगर में लोगों को सलाह दी गई थी कि वे घर से काम करें, क्योंकि दफ्तरों में सबके लिए पीने का पानी भी नसीब नहीं हो पा रहा था। बुंदेलखंड में हर वर्ष पानी का संकट सामान्य जीवन को अस्त-व्यस्त कर देता है। पानी के लिए हिंसक झड़पों की खबरें तो 2020 की ग्रीष्म ऋतु में भी सामने आर्इं, लेकिन मीडिया में उनकी चर्चा कम हुई।

जल संकट की खबरें भले ही पार्श्व में चली गई हों, लेकिन मनुष्यता के लिए पानी के संरक्षण की चिंता सबसे ज्वलंत मुद्दों में एक है। इसका बड़ा कारण यह है कि अपनी जल संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मनुष्य आज भी या तो प्रकृति पर निर्भर है या भूजल पर। ऐसे में जरूरी है कि हम प्राकृतिक जल भंडारण के स्रोतों के संरक्षण के प्रति संवेदनशील होते। लेकिन हमने परंपरागत जल स्रोतों के साथ बहुत सौतेला और स्वार्थ भरा बर्ताव किया। पुराने तालाबों, कुंओं, झीलों, बावड़ियों और कुंडों को उपेक्षित छोड़ दिया।

नदियों को प्रदूषित कर दिया। स्थिति यह है कि देश की अधिकांश नदियों का पानी कई जगहों पर पीने योग्य तक नहीं पाया गया है। इस सूची में पवित्र गंगा नदी भी शामिल है। ये प्राचीन जल-स्रोत न केवल अपने अस्तित्व में पर्याप्त मात्रा में जल भंडारण करते थे, बल्कि भू गर्भ के जल स्तर को बनाए रखने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते थे। लेकिन दुर्भाग्य से तरक्की के आधुनिक मानदंडों ने प्रकृति की इस संपदा पर दोहरा प्रहार किया।

न केवल परंपरागत जलस्रोतों को नष्ट किया गया, बल्कि मनमाने तरीके से भू-गर्भीय जल का दोहन भी किया गया। 1970 के दशक में हालात तब और खराब हुए जब सरकारों ने बिना भविष्य की संभावनाओं पर विचार किया देश भर में बड़े पैमाने पर नलकूप खुदवा डाले। इससे लोगों की त्वरित जरूरत तो पूरी हो गई, लेकिन भविष्य के लिए भंडारण की स्थिति भयावह हो गई। एक आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार 1975 में जो भूजल दोहन साठ प्रतिशत था, वह 1995 में बढ़ कर चार सौ प्रतिशत हो गया।

पानी को लेकर होने वाले संघर्षों की हर कहानी कतिपय वैज्ञानिकों की इस आशंका को बल देती है कि कहीं अगला विश्व युद्ध पानी को लेकर नहीं हो। वह भी तब जबकि पृथ्वी का दो तिहाई हिस्सा पानी से घिरा हुआ है। पर हम जब यह तथ्य जानते हैं कि पृथ्वी पर कुल उपलब्ध जल का 97.2 प्रतिशत पानी समुद्रीय है और उसका पीने में उपयोग संभव नहीं है, तो हम सावचेत होते हैं। वर्ष 1989 में पानी की उपलब्धता नौ हजार घन मीटर थी, जो सन 2025 तक पांच हजार एक सौ घन मीटर रह जाने की संभावना है। बढ़ते जल संकट का बड़ा कारण भूगर्भ जल का अंधाधुंध दोहन भी है।

केंद्रीय भू-जल बोर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में सन 2007 से 2017 के बीच भूगर्भ जल के स्तर में इकसठ प्रतिशत की गिरावट आई। हालत यह हो गई कि कई नदियों के किनारे बसे गांवों में भी लोगों को पेयजल की किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। महत्त्वपूर्ण यह है कि सारी दुनिया में भूगर्भ जल का प्रयोग करने के मामले में भारत अव्वल है। चीन और अमेरिका का स्थान क्रमश: दूसरा और तीसरा है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी)-खड़गुपर और कनाडा के अथाबास्का विश्वविद्यालय की एक संयुक्त शोध रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय औसतन प्रतिवर्ष दो सौ तीस घन किलोलीटर जल का उपयोग करते हैं। यह आंकड़ा वैश्विक एजेंसियों द्वारा मनुष्य समुदाय के लिए आवश्यक माने गए जल उपयोग के मानदंडों से अधिक है। माना यह भी जाता है कि एक निश्चित सीमा के बाद यदि जल का उपयोग किया जाता है, तो वह वस्तुत: उपयोग नहीं होता, बल्कि दुरुपयोग होता है।

हम हमारे दुरुपयोग को तार्किकता की कसौटी पर सही बताने के तरीके भले निकाल लें, लेकिन यह स्थिति डराती है। खासकर तब, जब नीति आयोग की जल प्रबंधन सूचिका का यह आंकड़ा पढ़ते हैं कि देश के पचहत्तर प्रतिशत घरों में आज भी जलापूर्ति की समुचित व्यवस्था नहीं है। स्पष्ट है कि इसमें अधिक संख्या वंचित तबके की है। संपन्न वर्ग की सुविधाभोगी आदतों से जन्में संकट का सामना इसी वर्ग को करना होता है।

कहते हैं कि प्रकृति के पास सब प्राणियों की आवश्यकता को पूरा करने योग्य संसाधन हैं, लेकिन वह लालच किसी का भी पूरा नहीं कर सकती। दुर्भाग्य से जल उपयोग के संदर्भ में मनुष्य जाति का व्यवहार लालची भी हुआ और लापरवाह भी। नदियों की शुचिता को प्रदूषण ने चुनौती दी तो कुंए, बावड़ी, कुंड, जोहड़ और तालाब जैसे परंपरागत जलस्रोत जमीन की लगातार बढ़ती भूख या अनदेखी के शिकार होते चले गए। वर्षा जल संग्रहण के जो परंपरागत साधन थे, आधुनिक जीवनशैली ने उन्हें भी अप्रासंगित मान लिया। ऐसे में आवश्यकता है कि हम जल के उपलब्ध भंडारण के संरक्षण के प्रति सचेत हों और वर्षाजल के संग्रहण के प्रति सजग रहें। यह सजगता ही हमें भविष्य की परेशानियों से बचा सकती है।

विजय गर्ग मलोट



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