ई-कचरा किसी महामारी से कम नहीं, ये अगर जंगलों तक पहुंच गया, तो इसके परिणाम सदियों तक रहेंगे

bttnews
0

 हम अभी भी कोरोना महामारी से मुक्त नहीं हुए हैं। अभी से भविष्य में दूसरी महामारी की चिंता बढ़ रही है। पर्यावरण विदवानों ने पहले ही चेतावनी दी थी कि अगर ई-कचरा और अन्य मेडिकल वेस्ट घरों से जंगलों तक पहुंच गए, तो इसके परिणाम भीषण और सदियों तक होंगे। पिछले महीने राष्ट्रीय बाल अधिकार एवं संरक्षण आयोग ने अपने एक अध्ययन के आधार पर चेताया था कि अगर समय रहते ईकचरे के खतरनाक पक्ष पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में लाखों बच्चे केसर या ऐसे ही अन्य खतरनाक रोगों की जद में होंगे। दुनियाभर में जैसे-जैसे इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की मांग बढ़ रही है, उसके साथ ही इलेक्ट्रॉनिक कचरा भी बढ़ता जा रहा है। ई-वेस्ट रिपोर्ट 2020-21 से पता चलता है कि वर्ष 2019 में 5.36 करोड़ मीट्रिक टन कचरा पेदा किया गया था, जोकि पिछले पांच सालों में 21 फीसदी बढ़ गया है। 

ई-कचरा किसी महामारी से कम नहीं, ये अगर जंगलों तक पहुंच गया, तो इसके परिणाम सदियों तक रहेंगे

अनुमान है कि 2030 तक इस इलेक्ट्रॉनिक कचरे का उत्पादन 7.4 करोड़ मीट्रिक टन तक पहुंच जाएगा।ईकचरा अर्थात ईलेक्ट्रानिक कचरा जिसमे इलेक्ट्रानिक वस्तुए अपशिष्ट के रूप में शामिल होते है, जोकि प्रायः व्यक्ति द्वारा उपयोग किए जा चुके होते हैं। इनमें वस्तुएं भी शामिल होती हैं जिनके जीवन का अंत हो चुका होता है। जैसे कि टीवी, फ्रिज, कूलर एसी, मॉनिटर, कंप्यूटर कैलकुलेटर, मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक मशीनों के कलपुर्जे आदि। जब से दुनिया में कोरोना वायरस का इफेक्शन फैला है, तब से मास्क, फेस शील्ड, पीपीई किट्स जैसे इक्विपमेंटस का इस्तेमाल भी काफी बढ़ गया है। पीपीई किट्स तो यूज एंड श्रो किस्म की होती हैं, चिंता बढ़ा रही हैं। परिणामतः अब दुनियाभर में इन बायोमेडिकल वेस्ट का एक बड़ा भंडार तेयार होता जा रहा है।


एसोचेम-नेक के अध्ययन में कहा गया है कि असुरक्षित ई-कचरे की रीसाइकलिंग के दौरान उत्सर्जित रसायनों के संपर्क में आने से तंत्रिका तंत्र, रक्त प्रणाली, गुर्दे और मस्तिष्क विकार, श्वसन संबंधी विकार, त्वचा विकार, गले में सूजन, फेफड़ों का कैंसर, दिल आदि को नुकसान पहुंचता है। मोबाइल फोनों में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक और विकिरण पैदा करने वाले कल-पुर्जे सैकड़ों साल तक जमीन में स्वाभाविक रूप से घुल कर नष्ट नहीं होते हैं। बता दें कि सिर्फ एक मोबाइल फोन की बैटरीहीछ लाख लीटर पानी आसानी से दूषित कर सकता है। जल-जमीन यानी हमारे वातावरण में मौजूद ये खतरनाक रसायन कैंसर जैसी कई गंभीर बीमारियां पैदा करते हैं। गौरतलब है कि भारत विश्व का सबसे बड़ा मोबाइल उपभोक्ता देश है। यहां पर वर्ष में 1.5 मिलियन टन से भी अधिक ईकचरा तैयार होता है।

वर्ष 2011 में ई-कचरा प्रबंधन के लिए कुछ नियम बनाया गया था, जिसमें उत्पादों पर राज्यों के प्रदुषण नियंत्रण बोर्डों से मिलकर अपने उत्पादों के जीवन के अंत का प्रबंधन जो पर्यावरणीय रूप से अनुकूल हो ऐसे उत्पादों का मानदंड तैयार

किया गया। उसके बाद हीई-कचरा प्रबंधन नियम 2016 बनाया गया। बहरहाल, इसमें कचरे के प्रबंधन को संबल प्राप्त हुआ जोकि कचरे के अंत में वापसी सुनिश्चित हुआ। साथ ही 'उत्पाद उत्तरदायित्व संगठन' के नाम से व्यवस्था भी बनाई गई। इसके अलावा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड यह निरीक्षण करेगा कि बाजार मे ऐसे कौन से उपकरण उपलब्ध हैं, जिनका निस्तारण संभव नहीं है तथा मानव और पर्यावरण के लिए खतरनाक हैं। उन सभी वस्तुओं को चिन्हाकिंत कर बाजार से वापसी की जायेगी। दुनिया में सबसे ज्यादा इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा करने वाले शीर्ष पांच देशों में भारत का नाम भी शुमार है, इसके अलावा इस सूची में चीन, अमेरिका, जापान और जर्मनी भी है। चिंता की बात तो यह है कि भारत के कुल ई-कचरे का केवल 5 फीसद ही खराब बुनियादी ढांचे और कानून के चलते रिसाइकिल हो पाता है, जिसका सीधा प्रभाव पर्यावरण में अपरिवर्तनीय क्षति और उद्योग में काम करने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।

भारत को ई-कचरे की समस्या के स्थायी समाधान के लिए यूरोपीय देशों में प्रचलित व्यवस्था की तर्ज पर पुर्नचक्रण तथा विधि प्रक्रिया विकसित करनी चाहिए। जहां इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के विनिर्माण में संलग्न संगठनों को ही इन उत्पादों को उनके अनुपयोग होने के पश्चात उनके पुर्नचक्रण के लिए जवाबदेह बनाया जाता है या तो कम्पनियां इन उत्पादों को स्वयं पुर्नचक्रित करती हैं या फिर इस कार्य को किसी तीसरे पक्ष को सौंप देती हैं। कई देशों में अपशिष्ट ई-कचरे से संबंधित शुल्क का भुगतान इसे इकट्ठा करने या लाने-ले जाने के लिए नहीं किया जाता बल्कि कचरे के निपटान के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए, स्वीडन और अमेरिका में भराव क्षेत्र में कचरा फेंकने के लिए भारी प्रवेश शुल्क वसूल किया जाता है। स्वीडन में 'भराव क्षेत्र कर' भी लगाया जाता है। 

भारी भरकम प्रवेश शुल्क नगर निगमों को भराव क्षेत्र में कचरा फेंकने से रोकता है। इसलिए, अब भारत को भी इसी तरह ई-कचरा प्रबंधन के लिए जल्द से जल्द उचित निर्णय लेने कि आवश्यकता है, क्योंकि हम कोरोना वायरस से आज नहीं तो कल मुक्त हो लेंगे लेकिन तब तक हम अपने इर्द-गिर्द मेडिकल वेस्ट और ई-वेस्ट का अंबार लगा चुके होंगे। इसलिए अभी समय है कि एक मेडिकल वेस्ट और ई-वेस्ट का खाका तैयार कर उसके प्रचालन पर जोर दिया जाए। अन्यथा ई-कचरा रुपी एक और महामारी भविष्य के लिए तैयार खड़ी है|


विजय गर्ग 

 शिक्षाविद् सेवानिवृत्त प्राचार्य

मलोट पंजाब

Post a Comment

0Comments

Post a Comment (0)